कविता · Reading time: 2 minutes

प्रेम छब्बीसी

प्रेम छब्बीसी
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प्रेम से बढ़के दुनियाँ में राहत नहीं
प्रेम से बढ़के दुनियाँ में चाहत नहीं

इक अनोखा ही दर्ज़ा रहा प्रेम का
प्रेम जैसी जगत में इबारत नहीं

ऐसे प्राणी नहीं होते मानव कभी
जिनके उर को लगी प्रेम की लत नहीं

प्रेम से ही प्रकट होते भगवान हैं
प्रेम के बिन है कुछ भी सलामत नहीं

जिस जगह प्रेम है सब कुशलक्षेम है
प्रेम के दरमियाँ आती आफ़त नहीं

प्रेम करता रहा है समर्पण सदा
प्रेम के पास टिकती बग़ावत नहीं

प्रेम-धागे से टूटे भी जुड़ते रहे
प्रेम को तोड़ दे ऐसी ताक़त नहीं

प्रेम अनुराग है प्रेम विश्वास है
प्रेम से है बड़ी जग में दौलत नहीं

प्रेम उन्मुक्ति है प्रेम बंधन भी है
इसमें चलती किसी की वकालत नहीं

प्रेम अभिमान है प्रेम बलिदान है
प्रेम में मात है ये हक़ीकत नहीं

दुश्मनों के लिए भी कभी कष्ट हो
प्रेम के पन्थियों की ये चाहत नहीं

ढंग नया या पुराना नहीं प्रेम का
प्रेम के बाद कोई इबादत नहीं

सारी दुनियाँ भी पीछे पड़े प्रेम के
पर मिटाने की इसको हिमाक़त नहीं

प्रेम रहता है संसार में हर जगह
ढूँढने की है इसको ज़रूरत नहीं

प्रेम किसको करें हम, करें ना करें
प्रेम-पुस्तक में ऐसी हिदायत नहीं

ढाई आख़र का ये एक उपहार है
इससे बढ़कर ख़ुदा की इनायत नहीं

प्रेम के सामने ज्ञान बौना हुआ
प्रेम-धन से बड़ी बादशाहत नहीं

प्रेम के हैं पुजारी सदा शख़्स जो
उनको होती किसी से हिक़ारत नहीं

प्रेम के घर में जा कर बसेरा करें
जिनके सर पर सहारे की है छत नहीं

करें प्रेम सबको रहें प्रेम से
प्रेम पहला सबक है महारत नहीं

जान पाते नहीं वो नशा प्रेम का
है शिराओं में जिनकी शराफ़त नहीं

कितने भी दिन-रात पढ़ लो सफ़े
प्रेम करने से बढ़ कर नसीहत नहीं

प्रेम निष्काम है प्रेम निष्पक्ष है
प्रेम लेता किसी की हिमायत नहीं

फैसला प्रेम का सबको स्वीकार्य है
इसके माफ़िक जगत में अदालत नहीं

प्रेम का नाम बदनाम करते हैं वे
प्रेम करने की जिनको लियाकत नहीं

प्रेम पूजा है इसकी हिफ़ाजत करें
प्रेम से खेलने की इजाज़त नहीं
-रमेश ‘अधीर’

Competition entry: "कुछ खत मोहब्बत के" - काव्य प्रतियोगिता
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