कविता · Reading time: 1 minute

प्रेम घुलनशीलता

***** प्रेम घुलनशील ****
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प्रेम भाव है घुलनशील
घुल मिल बनाए मिलनशील

लोभ, मोह नहीं हितकारी
क्रोध भाव में बनाए न शील

जल भुन कर राख बन जाए
ईर्ष्या भाव है ज्वलनशील

माता पिता होते हैं साहित्म
वात्स्यायन भाव हैं सुशील

वादे सदैव टूटते ही रहते
कोशिशें बनाती प्रयत्नशील

शूलों पर तुम चलना सीखो
कष्ट बना देते हैं सहनशील

मनसीरत उपासक बन बैठा
उपासना शेली प्रभावशील
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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