प्रेम के दोहे

प्रेम नाम अनमोल है, खरीद सके न कोय ।
त्याग, तपस्या, बलिदान बिन, ये न प्रापत होय ।।

प्रेम नाम एक भजन है, सहज न गावन जाय ।
बिन भक्ति जे न गवै, प्रेम करहि गव जाय ।।

प्रेम रूप अनेक है, किस रूप तोय सुहाय ।
जो जन जैसो मन करै, सो तैसोहि रूपहि पाय ।।

प्रेम अपार अनंत है, जो न कोई नापन पाय ।
जबहि डूबत प्रेम में, तबहि पारन पाय ।।

प्रेम की न कोनहू उमर है, न जाने कब ये होय ।
जिस घडी़ जे होत है, सुध-बुध सारी खोय ।।

प्रेम नाम विश्वास है, जो एक-दूजे पे होय ।
झूठ-फरेब़ को काम नहीं, न ही कोनहू स्वारथ होय ।।

प्रेम रस की खान है, चाख सके न हर कोय ।
जो चाखन को मन करे, पहले प्रेम मगन मन होय ।।

प्रेम में बाधा अनेक है, लांघ सके न हर कोय ।
जो बाधा लांघन करें, सोहि प्रेम प्रापत होय ।।

प्रेम तो आत्मिक मिलन है, शरीराकर्षण न होय ।
लोभ-लालच से न मिलें, न ही जबरन होय ।।

प्रेम बखान का-का करैं, कागद-मसि कम पड़ जाय ।
प्रेम बखान अनंत है, प्रेम करहि तर जाय ।।

—- डां. अखिलेश बघेल —-
दतिया (म.प्र.)

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