** प्रेम : कुछ दोहे **

** प्रेम : कुछ दोहे **
// दिनेश एल० “जैहिंद”

प्रीत जनमी प्रभु-मनवा, प्रकट हुआ ब्रह्मांड ।
प्रेम काम का रूप धर, बना जग-कर्म-कांड ।।

माटी की मूरत गढ़ै, _ जान देवै रब फूँक ।
दुनिया झूठे कोसती, हुई का रब से चूक ।।

तन जे भूखा प्रीत का, प्रीत-हिं मन हरसाय ।
देखि-देखि सुंदर बगिया, ईश्वर भी मुस्काय ।।

प्रीत करै सब लोगवा, प्रीत बिना जग ठूँठ ।
प्रीत जे होइ राम से, _ शेष प्रीत सब झूठ ।।

प्रीत मधुर होवै बड़ा, प्रीत हरै सब क्लेस ।
प्रीत-प्रीत में भेद पर, भार्या, कुटुम्ब, देस ।।

जग में प्रीत अस होवै, _ जाके रूप अशेस ।
प्रीत की खातिर ईश्वर , बदले नर का भेस ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
05. 01. 2018

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