प्रेम की अलख जगाई है

**प्रेम की अलख जगाई हैं**
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जितनी दरिया में गहराई है
दिलोदिमाग तक खूब छाई है

चाहें, दिल की गहराइयों से
बेशक नजरें तुम्हारी हरजाई है

तुम्हारे बिना ,कौन यहाँ हमारा
तुमने प्रेम की अलख जगाई है

क्या गिला,शिकवा,शिकायत
भाग्य में मिले गम व तन्हाई है

हर जन्म में रहे प्रेम के प्यासे
अगले जन्म में उम्मीद लाई है

तुम हुस्न ए शवाब मल्लिका
हमने साधारण सूरत पाई है

कब,कैसे,क्या मैं उम्मीद रखूं
तू तो हमेशा से ही पराई है

मनसीरत जनाजा रायसुमारी
तेरे आंगन मे बजी शहनाई है
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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