कविता · Reading time: 1 minute

प्रेंम घुलने का बिषय है….

बस! पलों का वक्त लगता,तन से तन के तो मिलन में|
बीत जाती सदियाँ लेकिन,मन से मन के तो मिलन में||
पत्थरों को मोंम करना, पड़ता है तपकर यहाँ,
तब कहीं जाकर निखरता प्रेंम सोने सा अगन में||

‘गर भाव हों संदेह के तो,प्रेम बन जाता गरल|
हों जटिल कितनी पहेली,प्रेंम कर देता सरल||
हारना दिल को है पड़ता, भावनाओ के समर में|
रणविजय होकर डटे तो, टूट ही जाओगे घर में ||
लाभ-हानि का गनित सब,अंश है व्यापार का|
जीत कर भी हारना,नियम सरल है प्यार का||
‘गर हो समर्पण और अर्पण,भाव मन के व्याकरन में|
तो,प्रस्फुटित होकर झलकता,प्रेंम तन के आचरन में||
बस! पलों का वक्त लगता…….

जातियाँ झूंठे रसूख, मजहबी आब-ओ-हवा|
नफरती नाशूर की है, प्रेंम ही बस! इक दवा||
प्रेंम घुलने का बिषय है, मजहबों को जोड़ देता||
प्रेंम है उन्मुक्त पंक्षी, सरहदों को तोड़ देता||
देश दिल का सोंप उनको, मन कबीरा हो गया|
रूह में उनको बसा कर, तन जंज़ीरा हो गया||
काट अंधेरी सदी जब, चाँद दिखता है गगन में|
तब कहीं संतोष मिलता, क्षुब्ध ह्रदय की तपन में||
बस!पलों का वक्त लगता………
🖋कवि लोकेन्द्र ज़हर

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