कविता · Reading time: 1 minute

–प्रीत की सीढ़ी–

कविता.. प्रीत की सीढ़ी
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शीतल मंद सुगंध साँसों से बहती आए।
मुख से फूल झरें गौरी जब तू मुस्क़राए।।

स्थिर हो गई है मन की नाव हृदय-सागर में।
लहरों की हलचल सुने तू पायल झनकाए।।

भौहों से डराती है मुख से न-न करती है।
पर दिल में उतरती है जब भी नयन लड़ाए।।

हृदय-कानन-कुंजन में मन मयूर नाच रहा।
मेघ नभ में छाए जब भी तू लट बिखराए।

शीत लहर-सी चली प्रेम की मन पागल हुआ।
सपने सजीले सजें याद तेरी जब आए।।

खंजन लज्जीत है जो तूने नयन उठाए।
बुलबुल शर्माती जब तू सरगमें बिखराए।।

प्रीत की सीढ़ी चढ़ने लगा प्रीतम सब भूल।
दीवाना दिल वह कहता जो तू कह न पाए।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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