प्रिय विरह - २

स्मृति प्रेम की नींद में, सुख क्रीड़ा का ध्यान।
सुख चपला की छटा, हर लेती है ज्ञान ।। १

अश्रु भीगते नित नयन, अविरल जल की धार।
मन व्याकुल तड़पे मिलन, प्रिय पथ रही निहार।।२

विरह अगन जलता बदन, जब प्रियतम हो दूर।
रक्त अश्रु रोते नयन,द्रवित हृदय मजबूर।।३

मन सागर के तीर पर, लोल लहर की घात।
कल-कल करती ध्वनि कहे, विस्मृत बीती बात I l४

बाँध दिए क्यों प्राण से, तुमने चिर अनजान।
विरह व्यथा बढ़ने लगी, विवश फूटते गान।। ५

गाती रहती चूड़ियाँ, पिया मिलन का राग।
चूड़ी ढीली हो गई, जली विरह की आग।६

मैं अक्सर झाँका करूँ, घने बादलों बीच।
दूर धरा से क्यों खड़े, बंजर मन दो सींच।। ७

एक आँख आँसू भरे, दूजे में है ख्वाब।
सागर हूँ ठहरा हुआ, दर्द भरा सैलाब।।८

तुम से लम्बी दूरियाँ, लेगी मेरी प्राण।
अब घर अा जाओ सनम, बनो नहीं पाषाण।। ९

ऐ मेरे हमदम सुनो, मेरी तड़प पुकार।
तरसे दर्शन को नयन, तुझ से करूँ गुहार।। १ ०

छोड़ अटरिया पर गया, सूरज मधुरिम शाम।
शीतल मंद पवन बहे, लेकर तेरा नाम।। ११

देख गहन काली घटा, मन में उठती हूक।
घन गरजे संग बिजुरी, करो नहीं अब चूक।। १ २

करवट-करवट रात ये, करती गई उदास।
अंतस बसता विरह का, ये कठोर आभास।। १ ३

जैसे मछली जल बिना, तुम बिन मैं निष्प्राण।
बरसो घन बन प्रीत का, दे दो जीवन त्राण।। १ ४

अद्भुत अनुपम सृष्टि सब, सरस सुखद मधुमास।
मधुर स्वप्न नित नयन में,अंतस जगती प्यास।। १५

यादों में आते कभी, कभी जगाते ख्वाब।
अलग-अलग अंदाज से, करते हो बेताब।। १६

कह दे तुमको बेवफा, मुझे नहीं मंजूर।
मैने सोचा ही नहीं, होंगे तुम से दूर।। १ ७

नित्य अश्रु बहते नयन, मधुर प्रेम की प्यास।
तरस रही तेरे लिए, शेष मिलन की आस।। १ ८

बिखर गए हैं स्वप्न सब, पतझड़ किया विनाश।
पुष्प सभी मुरझा गये, जला प्रेम का पाश।। १ ९

पवन वसंती सुन जरा, मेरे प्रिय को भेज।
फिर तन की ज्वाला घटे, सजे प्रणय का सेज।। २ ०

राह देखते देखते, आँखें हो गई लाल।
अब तो आ जाओ सजन, बीते कितने साल।। २ १

बिन साजन सुना लगे, ये मेरा घर-द्वार।
आ जाओ घर साजना, कब से पंथ निहार।। २२

सहना है मुश्किल बहुत, तेज विरह की डंक।
रही प्राण तन से निकल, प्रिय भर लो अब अंक।। २३

बारिश चाहूँ नेह की, अब कर दो बरसात।
करो नहीं अब, देर प्रिय,मानो मेरी बात।। २ ४

बाट जोहते जोहते, लगा गले में फाँस।
जो अब प्रिय देरी किये,फिर टूटेगी साँस।। २ ५

-लक्ष्मी सिंह

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