कविता · Reading time: 1 minute

प्रिय मित्र जुगाड़….

कहीं भी हो तुम्हारे बिना
सारे काम अधूरे जान
पड़ते हैं!
प्रिय मित्र ‘जुगाड़’
यदि तुम किसी बाबू
की टेबल पर लग गये
तो कागजी कामों
का सरोकार कैसे
भला रुक सकता!
यदि तुम किसी थानेदार
की जेब में लग गये तो भला
कैदी को सजा कहाँ
हो सकती है!
यदि तुम किसी स्कूल
के प्रिंसिपल से मिल
गये तो बच्चे को
स्कूल आने की जरुरत
भला कहाँ?
यदि तुम किसी सरकारी
विभाग में घुस गये तो
घूसघोरों का मुनाफा
भला कैसे रुक सकता
तुम अपने आप में ही
नहीं हमसे भी
इष्ट हो मित्र!
तुम्हारे बिना सब
अधूरा है!
.
शालिनी साहू
ऊँचाहार, रायबरेली(उ0प्र0)

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