--प्रियतम की आस --

अभी भी , याद है , वो नजारा
सुबह की सुखद बेला का…
वो तेरा “नींद” से उठ जाना
और मुझे “आवाज” देना “सिमरन-ओ -सिमरन”
शर्मायी सी कुम्लाई सी आँखों से “तुझे” देखना
सिर हिलाना उसका और यह कहना -“हम्म “..बोलो। ना ?
तू। …
कितनी देर के बाद आई है। ..
आज भी याद आयी है
वो, अगस्त का महीना वो भीगी बारिश में नहाई सी
मानो गोरी ने ली अंगड़ाई सी
ठंडी हवा का वो झोंका
तेरे बदन को छू कर कुछ “यूँ” लौटा
मेरा पास तेरा आना
लर्ज़ते कंपकपाते होठों से तेरा
चुपके से कह जाना
ये “सुबह” कितनी देर के बाद आई है
“तेरा-मेरा” मिलाप सँग लाई है
ये सुबह जरा “ठहर”‘ जा
आज “प्रियतम’ का भी संग लाई है
यूँ न :जल” मुझसे , देख के “ओ हवा”
तेरी सुबह ही मेरे “नूर’ पे चढ़ आयी है
आज “सुबह” कितनी देर के बाद आयी है
आज की “सुबह” कितनी “मुरादों’ के बाद आयी है
मेरा “मोलियाँ “बाँध -बाँध” के सारा
प्रेम का धागा – निपटा आयी है
के तू कब आ
आज सुबह
बस दिल बचा था, कुछ न था
मैं उसे भी बाँध आयी
मुझे-तुझे पाने की आस
ऐ सुबह, जब तू कल फिर से आ
मेरे प्रियतम को भी साथ ला

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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