May 12, 2021 · कविता
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प्राप्ति के भर्म में

राम को बेचा
धर्म को बेचा
जब कुछ न आया हाथ
बेच दिया अपनों को
विभीष्णो के हाथ .

निर्वस्त्र करने निकले थे
सर्वस्थ ध्वंश करने आय थे
अहं व्यंग के अति श्रोत से
निर्वस्त्र व ध्वंश हो गये
सम्पूर्ण विश्व के सामने.

अपनों को खोया
प्रदेश को खोया
खोया जगत में नाम
अहं व्यंग लोभ क्रोध
के नृत्य में भस्म हो गया
सर्व मान व सम्मान.
12 05 2021

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Taposh Kumar Ghosh
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Am multi lingual. Love meet people. Live LIFE as a Mystery to live. Books: Not... View full profile
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