प्रात काल जब सूरज निकला

-विष्णुपद छंद
विधान–२६ मात्रा १६,१०पर यति,और चरणान्त वर्णिक गुरु से

प्रात काल जब सूरज निकला,फैला उजियाला ।
नव प्रकाश नव जीवन भरता,हरता तम काला।

संदेशा दे आशाओं का,नव जागृति लाता।
रोम-रोम पुलकित हो जाता,नव झंकृति लाता।
प्रात काल तन को देता है,नव जोश- ऊर्जा –
जीवन का सिद्धांत बताता, नव संस्कृति लाता।
प्रकृति स्वर्णरूपी पहनी है, किरणों की माला।
प्रात काल जब सूरज निकला,फैला उजियाला ।

सूरज के उगते ही देखो, खग गीत सुनाएँ।
आनंदित है दसों दिशाएँ,सुख- समृद्धि छाएँ।
पत्ता-पत्ता हरा हुआ है, कुसमित हर डाली-
अवनी के कण कण में देखो, जीवन सरसाएँ।
हृदय तार को झंकृत करता, सौन्दर्य निराला।
प्रात काल जब सूरज निकला,फैला उजियाला ।

प्रातः काल अमृत बरसाती, बल संचयकारी।
भाँति-भाँति के पुष्प खिलें हैं, सुरभित फुलवारी।
भीनीं-भीनीं-सी खुश्बू है ,अवनी पर छाई-
मदमाती जब चली पवन तो, महक उठी क्यारी।
पुष्प-पुष्प पर डोल रहा है, भौंरा मतवाला।
प्रात काल जब सूरज निकला,फैला उजियाला ।

-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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