May 23, 2017 · कविता
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प्रातःकाल

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प्रातःकालीन प्रथम सूर्य किरण,
मंत्र मुग्ध बंधा मन का हिरण।

अचेत सृष्टि थी गहनता के कारण,
फैला प्रकाशपूँज किया तम हरण।

रूप,रस,गंध व नवीनता का वरण,
ईश्वरीय कलाकृति आलौकिक चित्रण।

किरणों के आगोश में धरा समर्पण,
हरियाली युक्त सौन्दर्य अतिआकर्षण।

पुष्प-किरीट व भ्रमरों का भ्रमण,
खग का नभ में स्वच्छंद विचरण।

प्रकृति सौन्दर्य का अनोखा दर्पण,
मधुमय,ज्योतिर्मय,नवजीवन अर्पण।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त शुद्ध वातावरण,
रोमांचकारी,स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण।

सस्ता,सरल,निःशुल्क औषधिग्रहण,
आनंदित,सुखद,सुरक्षात्मक आवरण।
????-लक्ष्मी सिंह ?☺

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लक्ष्मी सिंह
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MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is... View full profile
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