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प्रलय गीत

प्रलय गीत,
प्रकृति अब विश्राम करो।
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प्रकृति अब विश्राम करो,
तुम हो कितने प्रणम्य वीर,
क्यों परिश्रांत हुआ रुकते भी नहीं।
थम जाए तो मुख़्तलिफ़ ये घड़ियाँ,
तुम भी थोड़ा विश्राम करो।
कितना अविरत तेरा हृदय,
अभिशप्त हुआ भी न थकता है,
ऐ पवन के झोंके लहराते क्यों,
तुम भी तनिक विश्राम करो।

कितने अरमाँ थे दिल में तेरे,
कितने सपनें साकार हुए।
कब तक लिए तुफान दिलों में,
निस्तब्ध हुआ प्रतिबद्ध रहोगे।
मदहोशी में हैं तेरे चक्षु,
हे दिवा-रात्रि ! विश्राम करो ।
जाने तो निर्बल पुराकल्प,
तुम नूतन-नवीन श्रृंगार करो।

चंदन सा शीतल तेरा प्रकाश,
आलोकित करता सारे जग को।
निर्मल, धवल चाँदनी तेरी,
सदियों से यूँ ही व्यर्थ गई ।
जब मानव मन से,मिट सका न तिमिर,
फिर क्यों अकुलाए दग्ध हुए।
पक्षों की गति अब मिथक करो,
हे कलानिधि ! विश्राम करो।

हे वसुंधरे ! तुम हुई बोझिल,
इस मानव तन के दुष्कर्मों से,
शेषनाग के फन पर बैठी,
क्यों थकती नहीं परिक्रमों से।
थोड़ा विश्राम करो तुम भी,
हे धरणी-धरा ! विश्राम करो ।

धधक-धधक निज ज्वाला से,
कण-कण में प्राण दिया तूने,
तन-मन में समाहित तेरी उर्जा,
युँ ही व्यर्थ प्रवाहित होती है,
नभ में अविचल,अटल खड़ा रवि,
कब तक रहोगे प्रज्वल्यमान।
रुको,रुको, आराम करो,
हे प्रणतपाल ! विश्राम करो ।

ज्ञानदीप की ज्योति पर,
पड़ी है पपड़ियों का जाल।
इन जालों का रंग स्याह देखो,
ढक लेता है उजले मन को।
मानवता विक्षिप्त हो रही,
आज धुमिल हो रही है दीप्ति।
फिर क्यों निरंतर करते प्रयत्न,
हे रवि ! आलोकित प्रकाश पुंज,
तुम भी थोड़ा विश्राम करो।

तेरे पावन नदियों का जल,
अब पथ से विचलित हो रही।
नितांत गति से प्रवाहित होकर,
ढूंढता है उन चरणों को,
जिससे हो सके नवजगत सृष्टि,
इस दुर्भिक्ष समय की बेला में,
क्यों करते हो तुम अश्रुपात।
हर पल बहते हे सरित प्रवाह,
तुम भी रुको विश्राम करो।

मिथ्या ज्ञान के मद में डुबा,
नादान बना ये जनजीवन।
उलझकर खुद के भंवरजाल में,
गतिहीन जड़वत हो गये हैं।
इससे तो सार्थक पशु जीवन है,
मुक्त है जिसके मन की गतियां,
इन भूत-भविष्य के उलझनों से।
किस संशय में तुम उलझ गए,
हे जलधिपति ! विश्राम करो ।

अंधियारे सपनों में मानव सोता है,
पिपासा व जश्नों में डुबा हुआ सा,
अनभिज्ञ है कर्मपथ के सद्ज्ञान से,
पल-पल की माया से प्रेरित होकर,
मदहोश हुआ ही सोता है,
इस निद्रा के गहरे आँचल में,
तुम भी थोड़ा विश्राम करो।

मूर्छित अचेत हर तन नर का,
हर रिश्ते आज बेकार हुए।
सागर में रहकर लहरों से,
घबराता चितवन भ्रमजालों से।
इतना अशांत चित्त हर नर है आज,
तुम देख-देख घबराते हो।
किस पल का इंतजार है तुझको,
तुम निर्मल नीतिज्ञ विधान करो।

परखा है तुमने जीवन को,
हर जीवों के तन में जाकर।
देखा है तुमने स्वप्नों को,
हर मानव के मन में जाकर।
स्वरों के करूण क्रंदन में,
तुम रोते हो जग हँसता है।
पंचभूत जड़ित इस तन से तुम,
ज्यों निकल पड़े, जग रोता है।
नीरवता बिखेर दो भूतल पर,
अब समय आ चुका विश्राम करो।

तुम धरा के प्राण हो,
तुम आत्मा के मधुर बंधन।
अनन्त सत्ता के स्वरुप और,
शून्यता के प्रतीक हो तुम।
किसलिए निरंतर रहते गतिमान,
हे प्राणपति ! विश्राम करो ।
मैं कहता हूँ आर्तस्वर में तुझको,
हे महाशक्ति ! विश्राम करो।

प्रकृति अब विश्राम करो…

मौलिक एवं स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित
© ® मनोज कुमार कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि -१६ /०९/२०२१
मोबाइल न. – 8757227201

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मनोज कुमार "कर्ण" "क्यों नहीं मैं जान पाया,काल की मंथर गति ? क्यों नहीं मैं समझ पाया,साकार की अंतर्वृत्ति ? मोह अब कर लो किनारा,जिंदगी अब गायेगी । सत्य खातिर…
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