प्रथम योगदान के दिवस पर

हर किसी को जिंदगी की किसी लंबी पारी की शुरुआत का प्रथम दिन उसकी यादों में जीवन पर्यंत जीवित रहता है वह चाहे प्रेयसी अथवा प्रियतम के प्रथम मिलन की यामिनी हो या संभवत किसी की दूसरी पत्नी ( सौत ) जिसे नौकरी कह सकते हैं के प्रथम योगदान का दिवस हो । उस दिन जब मैं डायलिसिस यूनिट के वातानुकूलित उच्च प्रौद्योगिकी के शांत वातावरण में अपने ड्यूटी रूम में बैठकर कांच के पार्टीशन के उस पार डायलिसिस पर लगे मरीज की निगरानी कर रहा था और लोक सेवा आयोग से आए अपने नियुक्ति पत्र के बारे में सोच रहा था , साथियों की सलाह पर मैंने योगदान देने का निर्णय लिया । एक दिन की छुट्टी लेकर ले ली । अगले दिन सुबह 5:00 बजे मैं अपनी नियुक्ति के कागजात लेकर बस में बैठ गया और लगभग 3 घंटे बाद उस जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के कार्यालय में पहुंच गया । वह कार्यालय एक पुरानी इमारत में जिसकी चाहर दीवारी पर बड़े बड़े पीपल , बरगद , पाकड़ आदि के पेड़ उग आये थे में स्थित था और पंछियों के कलरव के अलावा उस इमारत के चारों ओर सन्नाटा पसरा था , अभी ऑफिस खुलने में करीब डेढ़ घंटा था । समय काटने के लिए मैं इधर उधर घूमने लगा तो देखा कि सामने एक ट्रक से कुछ बड़ी-बड़ी सफेद कपड़ो से बंधी 10 – 12 गठरियाँ उतारी जा रही हैं । मैंने वहां खड़े कुछ लोगों से पूछा यह क्या है ? उन्होंने बताया कि पास के किसी गांव में कल रात डकैती पड़ी थी अतः वहाँ से मृतकों की लाशें पोस्टमार्टम के लिए उतर रही हैं । मैं वहां से हटकर आसपास घूमने लगा । उस शहर की बंद दुकानों , नाली से कूड़े को निकालते स्वछक , आवारा घूमते सांडों , कुत्तों , रिक्शा , साइकिल वालों , गलियों के चबूतरों पर बैठे खाली लोगों के बीच गुजरते हुए समय काटने के उद्देश्य से किसी चाय वाले की तलाश में टहलते टहलते कब इतना समय गुजर गया कि करीब 10 बज गया । सीएमओ ऑफिस खुलने पर मैं अंदर गया । इस समय वहां के प्रांगण में करीब 400 – 500 आदमियों की भीड़ जुटी थी । वह कई प्रकार की कद एवं काठी के लोग थे वे अधिकतर धोती कुर्ता पाजामा आदि धारण किये और साथ में सिर पर गमछा और पैरों में जूता या चप्पल धारण किए हुए थे , उन सभी में केवल एक समानता थी कि भले ही उनके पैरों में फ़टे चमरौधे की सामर्थ्य न रही हो पर अधिकतर वे सब हथियार बंद थे , उनके कंधों पर एक या दुनालिया बंदूकें टँगी थी और उनके वस्त्रों के भीतर भरपूर अन्य देसी असलहों से लैस होने की पूर्ण संभावना नज़र आ रही थी ।
ऐसी भीड़ और इतने हथियारबंद लोगों को देखकर मैंने वहां किसी से पूंछा कि यह आज यहां क्या हो रहा है तो मुझे बताया गया कि आज अस्पताल में मरीजों को जो दूध बंटता है उसका टेंडर डाला जाएगा अतः यह लोग इसीलिए यहां एकत्रित हैं । करीब 12:00 बजे किसी तरह उस भीड़ से बचते बचाते मैं मुख्य चिकित्सा अधिकारी से मिला तो उन्होंने मुझे एक सुदूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की नियुक्ति का पत्र टाइप कर कर जल्दी से वहाँ जाने की सलाह दी ।
उस पत्र को लेकर मैं करीब 1:00 बजे बस से बस में बैठकर उस स्वास्थ्य केंद्र की ओर रवाना हुआ । उस बस के अंदर बस की घरघराहट और उसकी खिड़कियों से उठते शोर से भी ज़्यादा ऊंचे स्वरों में बात करते लोगों की आवाज मुझे अस्पष्ट सी सुनाई पढ़ रही थी जो बहुत रोचकता से किसी एक दिलवाले घोड़े तो कभी एक दिलवाले की तारीफ करने में लगे थे मैंने एक दिल – सिंगल वेंट्रीकल के बारे में पढ़ रखा था पर उस एक दिल के साथ किसी में इतनी खूबियां हो सकती हैं सुनकर मैं हैरान था और उनकी बातें समझ नहीं पा रहा था । बाद में स्वास्थ्य केंद्र के लोगों से जब मैंने उस एक दिलवाले का जिक्र किया तो उन्होंने बताया कि यहां पास में एक कस्बा है जिसका नाम एकदिल पुर है। दो दिन पहले वहां घोड़े तांगे की रेस का आयोजन हुआ था जिसमें एकदिल पुर वाले का घोड़ा तांगा जीता था शायद वह लोग उसी घोड़ा तांगा रेस के आयोजन की विशेषताओं का आपस में आदान प्रदान कर रहे थे । करीब 40 किलोमीटर एक टूटी फूटी इकहरी सड़क पर देर तक हिचकोले खाती बस ने चलकर मुझे एक ग्रामीण क्षेत्र के मोड़ पर उतार दिया और परिचालक ने मुझे बताया कि स्वास्थ्य केंद्र यहां से अभी 16 किलोमीटर दूर है , वहां जाने के लिए मुझे यहां से टेंपो मिलेंगे । कुछ देर इंतजार करने पर एक खूब धुआँ उड़ाता , शोर करता हुआ एक टेंपो आ गया जिसके आगे का आकार हाथी की सूंड की तरह लंबा था और जिस पर बोनट नहीं था उसके अंदर गेयर बदलने के लिए एक रॉड का हैंडल था जिसे जोर से अंदर बाहर घुमाकर गेयर बदला जाता था , उसमें आगे एक बड़ा सा पहिया था जो टेंपो को उछाल उछाल कर आगे घसीटता हुआ चलता था । वह सवारियों से भरा था पर उसके ड्राइवर ने मुझे देखकर वीआईपी का दर्जा देते हुए सहानुभूति पूर्वक अपने बराबर मैं बैठने की अनुमति दे दी । रास्ते में उसने उसी टेंपो में पीछे कुछ और बकरियां , औरतें बच्चे और उनके बच्चों के साथ उनके पिताओं को भी लाद दिया फिर कुछ दूर चलने के बाद एक पान की दुकान का खाली खोखा सड़क के किनारे पर खड़ा था , कुछ लोगों की मदद से उसने उस खोखे को भी टेंपो की छत पर लाद लिया । करीब 16 किलोमीटर दूर जाने पर उस टेंपो वाले ने मुझे एक गांव की ओर जाती हुई एक पतली सी सड़क के मोड़ पर उतार दिया और बताया कि वह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अभी यहां से लगभग 8 किलोमीटर दूर है ।
वहां उतर कर और कोई साधन ना देख कर मैंने सामने खड़े एक घोड़ा जुते इक्का वाहन चालक से मुझे उस स्वास्थ्य केंद्र तक ले जाने के लिए सशर्त तय किया कि अब वह रास्ते में मेरे अलावा और कोई और सवारी नहीं बैठ आएगा और एक इकलौती सवारी की बुकिंग की भांति मुझे वहां पहुंचाएगा । वह बोला आप बैठिए मैं रास्ते में कोई सवारी नहीं लूंगा और आपके बैठते ही तुरन्त चल पड़ूँ गा । यह तय कर हम तीनों मैं , इक्के वाला और उसका घोड़ा चल पड़े । चलते चलते बीच रास्ते में सड़क के मध्य में से एक परनाली बह रही थी जिस की पुलिया पर उसने इक्का रोक दिया , वहां कुछ ग्रामीण हरी मिर्चों से भरे बोरे लिए हुए खड़े थे अब वह इक्के वाला उतर कर उन ग्रामीणों की मदद से उन बोरों को इक्के पर लादने लगा । मेरे विरोध करने पर उसने कहा कि भैया सवारी ना बैठाने की बात हुई थी सामान न लादने की नहीं , समान तो मैं लाद ही सकता हूं । मेरा विवेक उसके तर्क से हार गया था फलस्वरूप उसने मुझे 8 बोरे हरी मिर्च अपने इक्के पर लाद कर उसके ऊपर आसन ग्रहण करवा दिया । मैं डरते डरते बैठा था कि कहीं यह हरी मिर्चियाँ मुझ पर चढ़ न जाएं पर उस दिन के अनुभव से मैं अब जानता हूं कि यह हरी मिर्ची केवल मुंह में से आते जाते ही स्वाद देतीं हैं तथा उन के ढेर पर बैठने से वह अपनी मात्रा के अनुपात में तकलीफ नहीं पहुंचाती हैं । हमारा घोड़ा फिर चल पड़ा दिन ढलने को था हवा ठंडी बह रही थी और एक दौड़ते इक्के पर अब उन हरी मिर्चों द्वारा निर्मित ऊंचे मंच जैसे स्थान पर बैठ कर मैं एक खूबसूरत सुहावनी ढलती शाम और हरे भरे खेतों के पार सुनहरे सूर्यास्त को देख आनन्दित हो रहा था । जिसे निहारते हुए समय कट गया और मैं स्वास्थ्य केंद्र के करीब पहुंच चुका था । मुझे इक्के वाले ने सहारे से उतारकर नीचे खड़ा किया और गांव की ओर धूल उड़ाती एक पगडंडी की ओर अपनी छड़ी से इशारा किया यहां से लगभग पांच – छह सौ मीटर की पैदल दूरी पर वह अस्पताल मिल जाएगा । मैं उसके इक्के से उतर कर उस पगडंडी पर चल पड़ा ।आगे चलने पर कुछ दूरी से लाउडस्पीकर पर गानों की आवाज आ रही थी और करीब जाते जाते मुझे वह क्षेत्र बांस बल्लियों , रंग बिरंगी पन्नियों की झालरों लाउडस्पीकरों , कुछ खोमचे वालों और लोगों की एक भीड़ से घिरा मेले जैसा प्रतीत हुआ । वह मेला एक इमारत के पास के खेतों पर जुटा था जिसे स्वास्थ्य केंद्र माना जाता था । मैंने वहां लोगों से पूछा कि एम ओ आई सी ( इंचार्ज ) डॉक्टर साहब कहां मिलेंगे तो उनमें से एक व्यक्ति ने मुझे एक तीन मंजिलें फ्लैटस के ब्लॉक की छत की ओर इशारा करके बताया वहां चले जाइए ।
उस छत पर कुछ लोग मुंडेर से सटी खाट पर पर बैठे थे । एक सज्जन की ओर इशारा कर के मुझे वहां उपस्थित लोगो ने बताया कि यही डॉक्टर साहब है जो उस इमारत की छत पर से नीचे उस भीड़ को निहार रहे थे । उन्होंने मुझसे मेरा परिचय जानने के बाद हाथ मिला कर बराबर वाली खाट पर बैठने को स्थान दिलाया और कहा आप बहुत ही भाग्यशाली हैं जो आज योगदान देने आ गए क्योंकि आज यहां गांव में दंगल और नसबंदी कैंप का का आयोजन था इसलिए मैं मिल गया वरना अब एक महीने बाद ही आपसे मुलाकात होती । मैंने एक कागज पर अपने योगदान का पत्र लिखकर उन को सौंप दिया और उन सभी के साथ नीचे खेत की मिट्टी में बने अखाड़े में चल रहे तथा मेरे लिए अभूतपूर्व दंगल का मजा लेने लगा । इसके पश्चात धीरे-धीरे सूर्यास्त हो गया , शाम ढली – और अंधेरा घिर गया । वहाँ के लोगों ने मुझे पानी के लिए विशेष रूप से सावधान किया कि साहब इस पूरे अस्पताल में सामने जो कुआं स्थित है , जब से इस कुएं में एक कुत्ता गिरकर कर मर गया था हम लोग इस कुएं का पानी नहीं पीते हैं तथा पानी पास के गांव से लाकर उपयोग में लाते हैं । आप भी इस कुएं का पानी मत पीना ।
अंधेरा घिरने के बाद दंगल समाप्त हो गया और शोरगुल शांत हो गया था । मुझे बताया गया कि आज से मुझे वहीं रहना चाहिए और वैसे भी अब इस इलाके में से बाहर जाने के लिए कोई साधन दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं होता है । फिर कुछ लोगों की मदद से अस्पताल के प्रांगण के मध्य में 1 – 2 खाटें और बेंच डाल दी गई मैं और एम ओ आईसी डॉक्टर साहब वहीं बैठ गए तभी फार्मेसिस्ट ने झुक कर एमओआईसी के कान के पास मुंह लगाकर फुसफुसाते हुए प्रश्न किया कि साहब संतरा लाएं की अनन्नास ? बाद में उन्होंने कुछ ध्यान मग्न होकर संतरा कहकर उसे जाने दिया । कुछ विलंब के पश्चात वह फार्मासिस्ट एक हाथ में संतरा नाम की शोरे से बनी देसी ठर्रे की शराब की बोतल व दूसरे हाथ में कुछ भुने चने लेकर उनकी सेवा में प्रगट हुआ। 2 – 4 गिलासों में वह ठर्रा बांट दिया गया । उन्होंने मुझे उसको गटकने के लिए कहा । यह सुन कर मेरे अंदर मेरे बचपन से ही साहसिक होने की प्रवृत्ति जाग उठी और मैं उस ठर्रे के गिलास में लोटे से पानी मिलाकर उसे अपने लिए हल्का करने लगा । इस बीच एमओआईसी साहब के अंदर कुछ परिवर्तन हुए ।
पहला उन्होंने अपना ठर्रे का गिलास उठाकर एक सांस में गटक लिया और गिलास खाट पर रखकर मुझे उसी हाथ के पंजे से रुकने का इशारा किया , फिर सांस रोके रोके ही उन्होंने अपनी दूसरी मुट्ठी में भरे भुने चनों को एक साथ अपने मुंह में ठूंस लिया और फिर उन्हें चबाते हुए उसी हाथ को ऊपर नीचे ले जाते हुए उल्टी जैसा महसूस करने का इशारा किया । थोड़ी देर तक उन चनों की जुगाली करने के पश्चात मुझे बताया कि यह ठर्रा एक बहुत ही कड़वा बदबूदार बेस्वादी चीज होता है इसको पानी मिलाकर नहीं पिया जाता है अतः वे इसे एक सांस में ही खींच लेते हैं यदि वे पीने के बीच में वे सांस ले लेंगे तो उन्हें उल्टी हो जाये गी , इसीलिए उसकी महक से बचने के लिए वे उसे एक ही सांस में खींच कर तुरंत चने चबा लेते हैं । उन्होंने मुझे भी ठर्रे में पानी मिलाकर उसको और बेस्वाद ना करने की सलाह दी और अपनी ही तरह मुझे भी उसी तरीके से पीने को कहा । नौकरी में योगदान देने के उपरांत का यह मेरा उनसे मिला पहला ज्ञान से भरा सबक था जो मुझे आज भी याद है । फिर उस दिन किस प्रकार अपने को अपने आप से साहसी सिद्ध करने के लिए मैंने उस हलाहल को उदरस्थ किया मुझे नहीं याद है , धरती डोल गई थी और कब मेरे सामने खाने को दाल रोटी आ गई और उसे खा कर कब हम लोग उन्हीं मकानों में से एक मकान की छत पर चढ़ कर कब सो गए मुझे नहीं याद है । रात में कई बार पटाखों के छूटने की आवाजों और उनके बीच – बीच में हुआँ – हुआँ की आवाजों से नींद खुल जाती थी । सुबह उठकर मैंने लोगों से पूछा कि कल रात को यहाँ कोई शादी थी जहाँ से यह आतिशबाजी पटाखों के जैसी आवाज कैसे आ रही थी ? तो उन्होंने मुझे बताया कि कल रात पास के गांव में डकैती पड़ी थी जिसमें हुई फायरिंग की आवाजें आ रही थीं जो बीच-बीच में सियारों की चिल्लाहट के शोर में मिल जाती थीं ।
अगले दिन की उस सुबह मेरा मन आंदोलित होने के सिवा बाकी सब कुछ सामान्य था । मैं चलने के लिए तैयार हो होकर गांव की हाट से आई जलेबी और पकोड़े का नाश्ता कर तैयार हो गया गया । हमें बताया गया कि 11:00 बजे सुबह सीएमओ साहिबा का निरीक्षण के लिए आगमन हो सकता है उसके बाद ही मुझे जाना चाहिए । मैं भी उत्सुकता रोककर एक जगह बैठ गया कुछ इंतजार के बाद धूल उड़ाती फर्राटे से एक सफेद एंबेसडर कार और एक जीप के काफिले के साथ सीएमओ साहिबा आईं । उनके उतरते ही उन ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया जो लोग कल दंगल कुश्ती का आनंद ले रहे थे वे ही अब घेराव कर नारे लगाने लगे यहां कोई डॉक्टर नहीं रहता है और उन्होंने एक मानसिक रूप से विक्षिप्त बिखरे बालों और फटे हाल कपड़ों में एक महिला को जबरदस्ती पकड़ कर उनके सामने रोक रखा था उनका यह आरोप था कि जबसे इसकी नसबंदी हुई है यह औरत पागल हो गई है । मैंने उन सब की दुविधा दूर करने के लिए उन्हें बताया कि इसे मानसिक रोग स्चीज़ोफ्रेनिया है और यदि आप लोग इसे मेडिकल कॉलेज में ले आए तो इसका मुफ्त में इलाज हो जाएगा और यह ठीक हो जाएगी । इस पर सीएमओ साहिबा ने सभी एकत्रित गांव वालों को आश्वस्त किया कि अब यह डॉक्टर साहब यहां आ गए हैं और यहीं आप सबके बीच मे रहकर आप की सेवा करेंगे । मेरे यह तर्क करने पर कि मानसिक रोग की दवाइयां यहां नहीं है । इस पर उन्होंने कहा आपके पास आयरन की गोली है मैंने सोच कर के कहा हां ।
तो वह बोलीं इसे आयरन की गोलियां दीजिए और फिर वे उसी त्वरित गति से वापस अपनी एंबेसडर कार में बैठ गयीं और थरमस में रखा पानी पीते हुए ड्राइवर को चलने का इशारा कर चली गयीं । वहां उपस्थित लोगों द्वारा उनसे चाय पानी का अनुरोध करने पर उन्होंने उनसे कहा कि आप लोगों की उपलब्धि बहुत खराब है अतः मैं यहां का पानी भी नहीं लूं गी ।
उनके जाते ही हम सब भी वहां से चलने को तैयार थे ऐसा महसूस हो रहा था कि कल से यहां कोई बारात टिकी हुई थी जिसके बाराती अब वहां से विदा लेने की तैयारी में थे । थोड़ी देर बाद एक खड़ खड़ा इक्का वहां आ गया जिस पर मेरे एमओआईसी डॉक्टर साहब मैं और कुछ 7- 8 ए एन एम बहन जी लोग जो किसी सी क्लास फिल्म की बी ग्रेड हीरोइन की वेशभूषा में सज धज कर आई थीं आकर एमओआईसी डॉक्टर साहब को गोपिकाओं की तरह घेर कर खड़ खड़े पर बैठ गयीं । मुझे भी घोड़े की दुम के पीछे , दाहिनी ओर बैठने के लिए स्थान दे दिया गया। घोड़ा हमें पतले सड़क के मार्ग से अपेक्षाकृत बड़ी पतली सड़क की ओर ले जाने लगा । एमओआईसी साहब कल रात की खुमारी, हैंगओवर मैं डूबे खड़ -खड़े की मुंडेर पर पर बैठे घुटनों पर एक एक्सेल शीट टाइप का कागज पसारे डीडीटी के खर्च का ब्योरा भरने में लगे थे । ए एन एम बहने उनसे उच्च स्वरों में हंसी ठिठोली , छेड़खानी करने में लगी थीं । जिस प्रकार मोटरसाइकिल पर चलते समय अचानक ब्रेक लगाने पर पीछे बैठी हुई सवारी को जो झटका लगता है कुछ इसी प्रकार के झटकों का एहसास वह घोड़ा दौड़ते हुए अपनी सवारियों को दे रहा था , शायद इसीलिए हमारे डॉक्टर साहब ने प्रस्थान के लिए इस वाहन को चुना था। मैं घोड़े की दुम के लहराते बालों को अपने आंख मुंह नाक कान में ना घुस जाने के प्रयास में अपने चेहरे को बचाते हुए रास्ता तय कर रहा था । किसी प्रकार वह सड़क आ गई जहां से कि मुझे वापस आने के लिए बस मिलनी थी । उन सबको अपनी – अपनी ज़िन्दगी के कार्यकलापों में व्यस्त छोड़कर मैं खड़ – खड़े से कूदकर अलग हो गया , वहां दोबारा कभी पलट कर वापस ना आने का इरादा ठान कर के आने वाली बस का इंतजार करने लगा । फिर एक प्राइवेट बस ने आकर मुझे मेडिकल कॉलेज के पास तक पहुंचा दिया । उस दिन देर रात हॉस्टल पहुंचने पर मुझे काफी देर हो चुकी थी , मेस में गया तो परात में कुछ ठंडे गत्ते के टुकड़ों की तरह पराठे पड़े थे जिन्हें चबाकर पानी पी मैं अपने कमरे में आ गया लेट गया ।
सोने से पहले मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि पिछले 36 घण्टों से मैं कोई भयावह सपना देख रहा था या धरातल पर की कठोर सत्यता से सामना करके लौटा था ।

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