प्रथम गुरू माँ ही होती

सार निछावर कर डाली है
भूमि वास कि वह माली है
लहू से अपने फूलों को सींचती
प्रथम गुरु माँ ही होती

स्वर लोरी मुख माँ की वीणा
सहती सदैव कुनबे में पीड़ा
कभी नहीं राजनीति करती
प्रथम गुरु माँ ही होती

खिलत मनोरम रूप कमल-सा
करुण भाव शैवालिनी जल-सा
सोम प्रकाश देती यश-कीर्ति
प्रथम गुरु माँ ही होती

त्रिलोक में माँ जैसी नहीं देवी
माँ में समाएं कोटि रवि
छोडू नहीं माँ तेरी भक्ति
प्रथम गुरु माँ ही होती

थाली सजाकर करू मैं आरती
अखंडता की माँ है शक्ति
माँ साक्षात प्रभु की मूर्ति
प्रथम गुरु माँ ही होती

नाम:- नवनीत पाण्डेय (चंकी) s/o श्री रमेश पाण्डेय
पता:- ग्राम+पोस्ट:- सेवटा, तहसील :- सदर
जनपद:- आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश, पिन कोड:- 276128

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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