प्रतियोगिता हेतू "माँ"

-: माँ के आँसू :-

कितना हलचल होता होगा ,
अंतस का समुन्द्र उछलता होगा l
किनारो से चोट खा कर ,
आँसू बन कर बहता होगा ll
आँसू आँखों में आया न होता ,
दिल का दर्द यू गया न होता l
आँसू का कीमत पूछो उनसे ,
जिनके सर माँ का साया न होता ll
देख कर बेटे के कद की उचाई ,
पिता के आँखों में आंसू भर आयी l
चहकता देख कर अपने बच्चे को ,
माँ भी आँसू रोक नहीं पायी ll
माँ ने सोचा इस मौके को खास बनाते है ,
खास मौके पर गंगा जल तो सब चढ़ाते है l
मौका बेहद खास है मेरे जिगर के लिए ,
आज इष्ट के चरणों में पूरा सागर चढ़ाते है ll
बहुत खुश हुयी माँ आँसू छलका दी ,
इष्ट के चरणों में पूरा सागर चढ़ा दी l
खरा सागर था तो कुछ भी नहीं ,
आँखों में भर कर माँ ने मान बढ़ा दी ll
बेटा खूब बढ़ा और बढ़ता गया ,
सीढ़ी चढ़ा और चढ़ता गया l
अर्थ तृष्णा में वह माँ का बेटा,
दूर हुआ और होता गया ll
चला तृष्णा की राह पे ,
खोया कामिनी की चाह में l
भुला अपनी माँ को वह ,
कभी आह में कभी वाह में ll
उलझा रहा खुद के बुने जाल में
माँ आयी एक दिन ख्याल में l
सुध आयी माँ की तो लौट आया ,
माँ मिली उसको कंकाल में ll
स्वरचित एवं मौलिक रचना ©BP YADAV

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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