*प्रतिज्ञा*

मन का दीप जलायेँगे
गीत खुशी के गायेँगे
फूलों सा बनकर के हम
इस जग को महकायेँगे
*धर्मेन्द्र अरोड़ा*

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*काव्य-माँ शारदेय का वरदान * Awards: विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित
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