May 9, 2017 · कविता
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प्रजातंत्र

अब कौन का तंत्र हैं.
कहने को प्रजातंत्र है.
मौलिकता की खोज में.
वादो यादो की सोच में.
जरा ठहर अभी तो जागा हैं.
मुल्क मेरा क्यो अभागा है.
चोरी कर हुकमरान गाते हैं.
लाशो में सज जवान घर आते है.
शहादत की गरिमा का हुकमरान माखौला उड़ाते हैं….
अब कौन सा तंत्र हैं.
कहने को प्रजातंत्र हैं.
मिट्टी की बनावट कैसी हुई.
कश्मीर की आवाम क्यों मैली हुई.
क्यों देश विरोध की गाथा है.
क्यां पत्थरों की प्रजातंत्र में कोई मर्यादा है.
आतंकि की खेप सजाई हैं.
तेरे मस्तक पर चोट लगाई हैं.
अब कौन सा तंत्र है.
कहने को प्रजातंत्र हैं.

अवधेश कुमार राय “अवध”

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अवधेश कुमार राय
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मैं अवधेश कुमार राय आप के लिए अपनी रचना लेकर आया हुं, पत्रकारिता के साथ... View full profile
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