Skip to content

प्रजातंत्र

अवधेश कुमार राय

अवधेश कुमार राय

कविता

May 9, 2017

अब कौन का तंत्र हैं.
कहने को प्रजातंत्र है.
मौलिकता की खोज में.
वादो यादो की सोच में.
जरा ठहर अभी तो जागा हैं.
मुल्क मेरा क्यो अभागा है.
चोरी कर हुकमरान गाते हैं.
लाशो में सज जवान घर आते है.
शहादत की गरिमा का हुकमरान माखौला उड़ाते हैं….
अब कौन सा तंत्र हैं.
कहने को प्रजातंत्र हैं.
मिट्टी की बनावट कैसी हुई.
कश्मीर की आवाम क्यों मैली हुई.
क्यों देश विरोध की गाथा है.
क्यां पत्थरों की प्रजातंत्र में कोई मर्यादा है.
आतंकि की खेप सजाई हैं.
तेरे मस्तक पर चोट लगाई हैं.
अब कौन सा तंत्र है.
कहने को प्रजातंत्र हैं.

अवधेश कुमार राय “अवध”

Author
अवधेश कुमार राय
मैं अवधेश कुमार राय आप के लिए अपनी रचना लेकर आया हुं, पत्रकारिता के साथ लेख, रचना, कहानी, कविता ,शायरी आप के लिए........ हमारी रचना के लिए संपर्क करें ब्लाग awadhmagadh.blogspot.com.
Recommended Posts
कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है?
कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है फिर भी ठंड का इतना मज़ा क्यों है? ये सिहरन, ये ठिठुरन ये गरमाई क्यों है देर से उठने... Read more
बेटियाँ तो बाबुल की रानियाँ हैं
मन का मृदंग हैं, भाव हैं, तरंग हैं, कल्पनाओं की पतंग हैं निर्झर, निर्मल, नेह भरी, ये वात्स्ल्य पूर्ण रवानियाँ हैं फिर भी बोलो आखिर... Read more
बेटियाँ तो बाबुल की रानियाँ हैं
मन का मृदंग हैं, भाव हैं, तरंग हैं, कल्पनाओं की पतंग हैं निर्झर, निर्मल, नेह भरी, ये वात्स्ल्य पूर्ण रवानियाँ हैं फिर भी बोलो आखिर... Read more
आँखों में पानी क्यों नहीं
ढूँढ रहा हूँ मैं तो जवाब इस सवाल का वतन पर मिटती है अब जवानी क्यों नहीं/ इस धरा पर दूर तक सागर का विस्तार... Read more