प्रगति बन गई प्रकृति की सौतन

भाव भंग लिपटी एक अलबेली,
अवतरित हुई प्रगति नार नवेली ।
करने मानव को निज ओर आकृष्ट,
तरल स्नेह की करती हुई वृष्टि ।
अनुजा भान प्रकृति उसे स्वीकार किया,
निज अवयव से उस तरुणी का श्रृंगार किया ।
पा लिया जब सा औदन,
प्रगति बन गई प्रकृति की सौतन ।

छीन लिया तरूवर की छाया,
बदल दिया गांव गांव की काया ।
क्रीडा करलव करते जहाँ बाल-गोपाल,
दिख रहा आज वहाँ उद्योग विशाल ।
चला दिया प्रकृतिहृदय पर आरी,
कट रहा पीपल बरगद संग झुरमुट झाड़ी ।
हो रहा आज पर्यावरण पतन,
प्रगति बन गई प्रकृति की सौतन ।

कल-कल करती थी नदियाँ सारी,
बिलुप्त हो रही बन सरस्वती बेचारी ।
पाप-ताप-संताप हारिणी गंगा,
दूषित हो उड़ चली बन विहंगा ।
जलधि का था कितना कंचन लहर,
रसायन संग बन गया आज जहर ।
हो रहा माता-पुत्र स्नेह का खंडन,
प्रगति बन गई प्रकृति की सौतन ।

विध्वंस प्रकृति देख आया आँखों में पानी,
सुनी हमने विक्षिप्त ज्ञानी की वाणी ।
उजड़े घर आता नहीं क्या कभी रवानी,
जा पूछ नन्हे बालक से उसकी उजड़ी कहानी ।
क्रीडा कौतुक का था उम्र कितनी सुहानी,
बन व्यस्क ढूंढ रहा था दाना पानी।
छीन गया बालक का कहीं बचपन,
प्रगति बन गई प्रकृति की सौतन ।

जीर्ण शीर्ण होगा मानव का जब यौवन,
छोड़ चलेगी प्रगति उसे उसी क्षण ।
धरती पर हाहाकार हुआ कुछ ऐसा ,
निगलने को तड़पती प्रगति सुरसा जैसा ।
बाढ प्रलय का रुप दिख रहा विक्राला,
मरे चिता पर क्या करोगे मलाल ।
बचा ले रे मनुज अपना ही जीवन,
प्रगति बन गई प्रकृति की सौतन ।

एक एक पौधा क्या न कर सकता है प्यारे,
स्वस्थ, सुन्दर, खुशहाल हुआ जन इसी सहारे ।
स्वस्थ समृद्ध जीवन यदि पाना है
हर मनुज को आज वृक्ष लगाना है
निज संग बचाले जग की जिंदगानी,
सच्ची स्वतंत्रता की होगी यही निशानी ।
प्रकृति – प्रगति – प्रवृत्ति का करो मिलन,
प्रगति बन गई प्रकृति की सौतन ।

–उमा झा

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