Aug 16, 2016 · कविता

प्रकृति

प्रकृति के प्रकोप से सहम गया इन्सां
मंज़िल भी पुकारे पर राहें करती हैरां
पग-पग आज़माइश है पर न हो परेशां
कभी घने कोहरे कभी हिम के निशां
चेहरे भी बदलते कभी बदलते हैं गुमां
आशियां मिले किसी को मिलता आसमां
वक्त तो लेता है पल प्रतिपल बस इम्तिहां।।।
कामनी गुप्ता***

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