प्रकृति

*मुक्तक*
वृक्ष नम्रता -त्याग सिखाता, नदियाँ देना सिखलाती।
द्युति किरणें दुख रूपी तम, को हर लेना सिखलाती।
बूंद बूंद को जोड मेघ सम, बरसाते जल को सबमें।
गतिशील प्रकृति कुदरत की भी , जीवन खेना सिखलाती।
अंकित शर्मा’ इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ,सबलगढ(म.प्र.)

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