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प्रकृति में सूर्य तत्व की महत्ता और पर्यावरण संरक्षण

Jan 14, 2018

मकर संक्रांति पर विशेष –

प्रकृति में सूर्य तत्व की महत्ता और पर्यावरण संरक्षण
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सूर्य प्रकृति का केन्द्र है । उससे ही प्रकृति अपनी समस्त शक्तियाँ प्राप्त करती है । संसार की संपूर्ण सत्ता व विकास सूर्य पर ही अवलंबित है । सूर्य से ही वृष्टि , वृष्टि से अन्न और अन्न व जल से जीव अपना पोषण करते हैं । सूर्य के कारण ही प्रति दो माह में रितु परिवर्तन होता है । इस जलवायु चक्र द्वारा सूर्य पृथ्वी के वातावरण को नियंत्रित रखता है । प्रकृति में सूर्य तत्व की इसी महत्ता को भारतीय संस्कृति में स्नान , दान , ध्यान आदि से नमन करने का महापर्व है मकर संक्रांति । इस दिन सूर्यदेव उत्तरायण होना शुरु होते हैं । इसके साथ ही धरती के उत्तरी गोलार्द्ध में शीत रितु की ठंडक में कमी आने लगती है । इस समय सूर्य की किरणें औषधि का काम करती हैं । इसी कारण मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने का विशेष महत्त्व है । पतंग उड़ाते समय हमारा शरीर सीधे सूर्य की किरणों के सम्पर्क में आता है , जिससे सर्दी से होने वाले रोग नष्ट हो जाते हैं और हमारा शरीर स्वस्थ रहता है ।

भारतीय संस्कृति में प्राचीन समय से ही मनुष्य के स्वास्थ्य व पर्यावरण संतुलन के लिए कुछ नियम बनाये गये । जिनका पालन करने के लिए धर्म का सहारा लिया गया ।
सामाजिक , धार्मिक मर्यादाओं की स्थापना करने के लिये रिषी मुनियों ने वेद साहित्य के माध्यम से जन मानस को धर्म अधर्म व पाप पुण्य से जोड़कर जो रीति रिवाज़ बनाये उनके मूल में पर्यावरण संरक्षण संबंधी समस्याओं के समाधान भी निहित हैं ।

भारत में वेदों की रचना भी वैज्ञानिक आधार पर ही मानी जाती है । इनमें सृष्टि के जीवनदायी तत्वों का सूक्ष्म व विस्तृत वर्णन है । रिग वेद का प्रथम मंत्र ही जीवन के निर्माणकारी तत्तों में से एक तत्व अग्नि को समर्पित है । ” ऊँ अग्निमीले पुरोहितम् यज्ञस्य देवमृत्विजम् । ” यजुर्वेद में वायु के गुणों , कार्य और उसके विभिन्न रूपों का आख्यान मिलता है । अथर्व वेद में पृथ्वी तत्व का वर्णन हुआ है । वेदों के अनुसार बाह्य पर्यावरण की शुद्धि हेतु मन की शुद्धि प्रथम सोपान है । जीवन निर्माण के पाँचों तत्वों के संतुलन का ध्यान वेदों में रखा गया है । इन तत्वों में किसी भी प्रकार के असंतुलन का परिणाम ही पर्यावरण में विभिन्न प्रकार के प्रदूषण सुनामी , ग्लोबल वार्मिंग , भूस्खलन , भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाएँ हैं ।

वेदों में पर्यावरण-सन्तुलन का महत्त्व अनेक प्रसंगों में व्यंजित है। महावेदश महर्षि यास्क ने अग्नि को पृथ्वी-स्थानीय, वायु को अन्तरिक्ष स्थानीय एवं सूर्य को द्युस्थानीय देवता के रूप में महत्त्वपूर्ण मानकर सम्पूर्ण पर्यावरण को स्वच्छ, विस्तृत तथा सन्तुलित रखने का भाव व्यक्त किया है। इन्द्र भी वायु का ही एक रूप है। इन दोनों का स्थान अन्तरिक्ष में अर्थात् पृथ्वी तथा अाकाश के बीच है। द्युलोक से अभिप्राय आकाश से ही है। अन्तरिक्ष (आकाश) से ही वर्षा होती है और आँधी-तूफान भी वहीं से आते हैं। सूर्य आकाश से प्रकाश देता है , पृथ्वी और औषधियों के जल को वाष्प बनाता है, मेघ का निर्माण करता है। उद्देश्य होता है पृथ्वी को जीवों के अनुकूल बनाकर रखना ।

भारतीय ऋषियों ने सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को ही देवता स्वरूप माना है साथ ही इनकी दिव्यता के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किये हैं। ऋग्वेद के धावा-पृथिवी सूक्त में आकाश को पिता और धरती को माता मानकर उससे अन्न और यश देने की कामना की गई है । माता की सघन संवेदना एवं पुत्र की गहरी कृतज्ञता के मधुर सम्बन्ध ही अब तक प्रकृति एवं पर्यावरण के गति चक्र को अनुकूल बनाये रख सके हैं । ऋग्वेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रकृति का अतिक्रमण तो देवों के लिये भी निषिद्ध है , फिर मनुष्य को भला कैसे इसको क्षति पहुँचाने का अधिकार मिल सकता है ।

आज विश्वपर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, उससे कर्म में असन्तुलन उपस्थित हो गया है। इससे बचने के लिए वेद-प्रतिपादित प्रकृति पूजा का सात्त्विक भाव अपनाना पड़ेगा । इस संदर्भ में ऋग्वेद के ऋषि का एक आशीर्वादात्मक उद्गार है ‘ समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे, नदी, पर्वत, वन, उपवन सब स्वच्छ रहें, गाँव, नगर सबको विस्तृत और उत्तम परिसर प्राप्त हो, तभी जीवन का सम्यक् विकास हो सकेगा । ‘

प्रकृति के वंदन की सुंदर प्राचीन परंपरा को आधुनिक विकास ने भारी क्षति पहुँचायी है । वंदन के स्थान पर प्रकृति का दोहन कर वैभव और विलासितापूर्ण जीवन शैली ने हमारे पर्यावरण व स्वास्थ्य को संकट में डाल दिया है । फलस्वरूप जीवन भी संकटग्रस्त है । प्राकृतिक आपदाएँ , प्रदूषण आदि क्रूरतम रूप ले रहे है । वैज्ञानिक , राजनेता सभी इनसे बचने के उपाय ढूँढ रहे हैं । इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक है कि हम सभी मिलकर मन कर्म वचन से अपनी प्राचीन विरासत को सँजोकर वैदिक संस्कृति पर चलते हुए पर्यावरण संरक्षण को अपना धर्म बनायें । जब हम मनुष्य अपने आचरण और व्यवहार से प्रकृति रूपी देवी के क्रोध को शांत करेंगे तभी हमारा जीवन शांत और सुखी होगा ।

डॉ रीता
असिस्टेंट प्रोफेसर
(राजनीति विज्ञान)
एन के बी एम जी (पी जी) कॉलेज,
चंदौसी (सम्भल)

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Rita Singh
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