दोहे · Reading time: 1 minute

प्रकृति ने ही हमें दिया , जल जैसा उपहार,

प्रकृति ने ही हमें दिया,जल जैसा उपहार,
हम हरियाली काट कर,मिटा रहे श्रृंगार

आसमान को ताकते , बेबस से ये नैन
गर्मी से झुलसा बदन , खोया मन का चैन

नदियों के इस देश में , प्यासी सी अब प्यास
बड़ी दरारे अब लिए , दिखती धरा उदास

अब आँखों की भीगती , नहीं दर्द से कोर
नफरत लालच स्वार्थ के, इसमें बैठे चोर
डॉ अर्चना गुप्ता

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