प्रकृति के दोहे

शुभ संध्या मित्रों!
——–दोहे——👌
बैठ प्रीत की छाँव में,उतरे सारी हार।
तन-मन निखरे नूर से,देख रंग गुलज़ार।।

बैठ प्रकृति की गोद में,माँ-सा मिले दुलार।
सबकुछ देती स्नेह से,ममता का आधार।।

जीवन जिसके हाथ में,करे प्रकृति बरबाद।
बैठा काटे डाल वो,कैसे हो आबाद।।

आया सावन झूम के,पेड़ लगाओ यार।
हरी-भरी धरती बने,स्वच्छ हवा उपहार।।

हरा-भरा सब देखके,बढ़ता जाए ख़ून।
सजता मौसम चक्र तो,रहता कहीं न सून।।

पेड़ लगाके प्यार से,सींचो जब तक चाह।
देख मेहनत रूप को,निकले एकदिन वाह।।

पेड़ हमारा साथ दें,सूखें लकड़ी अंत।
छाया ये फल फूल दें,स्वार्थी नहीं अनंत।।

महके उपवन बैठ के,रोगी बने निरोग।
रोता हँस दे शान से,संगत का कर भोग।।

सुंदरता को देख के,बढ़े उम्र है ख़ूब।
दुख छूमंतर देखिए,मिलता जब महबूब।।

प्रीत प्रकृति से जोड़िए,छूटे जग का भार।
समय मस्त हो बीतता,स्वर्ग बने संसार।।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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