प्रकृति का निराला खेल

(दृश्य-:- एक परिवार जिसमें माता-पिता-डॉक्टर,3 बच्चे, डॉक्टर साहब घर पर नही है। दो बच्चे घर के अंदर खेल रहे , एक माँ के साथ………आगे …………..पढ़िए……””प्रकृति का निराला खेल””””)

ममतामयी माता छोटे लल्ले को,
भर बर्तन में पानी।
उजला करने तन उसका,
बिठा बर्तन में, नहला रही थी।।
अपने लाड़ले से तोतली बातें,
सुन तोतले गाने।
तोतली भाषा में खुद भी,
गाने गुनगुना रही थी ।।
माँ का लाड़ला खेले पानी,
बोल बोले मम्मा नानी ।
थप थप करता लाड़ला पानी,
मम्मा साबुन लगा रही थी ।।
दौड़, घर के अंदर की, दो बच्चों
की मौजूदगी जता रही थी।
कितना खुश है घर का मंजर,
किलकारियां बता रही थी।।
आओ डॉक्टर डॉक्टर खेलें,
अंदर से आवाज आ रही थी।
मम्मी आवाज अंदर की सुनने,
अपने कान लगा रही थी ।।
एकदम शांत हुआ माहौल ,
फिर जोरों से आवाज आई।
बचाओ, मम्मी इसने काटा मुझको ,
फिर आवाज रुन्धती जा रही थी ।।
ज्यों ही घर के अंदर देखा,
मंजर बिगड़ पड़ा था ।
एक लाड़ला मेज पर पड़ा, दूजा,
सीजर चाकू लिए खड़ा था।।
खून से लथपथ बेटा पाकर,
माँ क्रोधित स्वर में चिल्ला रही थी।
ये क्या कर डाला तूने पगले, पर,
आँखें बच्चे की आपरेशन बता रही थी।।
माँ को क्रोधित देख बच्चे को,
सुध न याद आ रही थी।
खुद को बचाने भाग ले बच्चे,
युक्ति यही सुझा रही थी।।
माँ ने लथपथ बच्चा कार में डाला,
अब माता कार निकल रही थी।
मम्मी बचाओ, मम्मी बचाओ, इस बार,
आवाज कार के नीचे से आ रही थी।।
देख न पाई थी माता उसको,
माता तो कार निकाल रही थी।
डर के छिपा था कार के नीचे, अब
साँसे उसकी भी न आ रही थी ।।
दोनों बच्चों को देख, आया ध्यान
मैं एक को नहला रही थी।
तीसरे बच्चे को बर्तन में, देख..
मौत कैसे सुला रही थी।।
एक मिनट पहले माता,
गाने गुनगुना रही थी।
अपने लाड़लों के जीवन के,
प्यारे सपने सजा रही थी।।
अब कितना भयावह दृश्य,
तीनों की लाशें बता रही थी।
पगली सी माता तीनों को बचाने,
पल-पल तीनों को उठा रही थी।।
आँसू बर्फ बने माता के,
ह्रदय धड़क ना पाता।
बर्फानी माता कुछ ना कहती,
खामोश अपनी व्यथा बता रही थी।।
क्या सजा डाला प्रकृति ने जय,
अपनी किस्मत को जता रही थी।
मैं तो नहला धुला कर, अपने
बच्चों के बस,.सपने सजा रही थी।।

संतोष बरमैया “जय”
कुरई, सिवनी, म.प.

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