.
Skip to content

“प्रकृति और मानव”

Dr.rajni Agrawal

Dr.rajni Agrawal

दोहे

June 17, 2017

“प्रकृति और मानव”
(१)वन उपवन खंडित लखे, तरुवर सरिता खोय।
निर्झर नयना नीर भर, बेसुध धरती रोय।।

(२)फल लकड़ी छाया सहित,पुष्प दिए उपहार।
शाख पत्र आतप हरैं,वृक्ष करैं सिंगार।।

(३)शीतलता हिय धार कै,सरिता प्यास बुझाय।
चरण पखारै शैल कै, हरित आभ मन भाय।।

(४)शैल उठे नभ चूमने, उच्च मनोरथ धार।
देख धरा नीरव हिया,मेघ लुटाएँ प्यार।।

(५)भौतिकता चश्मा चढ़ा, मानव अति बौराय।
वन उपवन को काटि कै,दानवता अधिकाय।।

(६)मानव नरभक्षी हुआ, हाथ धरै हथियार।
मानवता को भूल कै, खूब करै संहार।।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी (मो.-9839664017)

Author
Dr.rajni Agrawal
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका। उपलब्धियाँ- राज्य स्तर पर ओम शिव पुरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, काव्य- मंच पर "ज्ञान भास्कार" सम्मान, "काव्य -रत्न" सम्मान", "काव्य मार्तंड" सम्मान, "पंच रत्न"... Read more
Recommended Posts
उपवन
प्रकृति रचित, मानव सिंचित, श्रमिक का श्रमदान अधिक सुहावन, मन लुभावन, पावन उद्यान ओस बिन्दु, तितलियाँ भँवरें, सुगन्धित स्थान नयनाभिराम, रोमांच तन, कुसमित मुस्कान।
प्रकृति
हाइकु प्रकृति सुंदर सृष्टि सींचे इंद्रधनुष खुशी सिंदुरी। फैला गंदगी शोध समीक्षा करें मानव। बुढाये ख्वाब साझा धरा का कोना रोती प्रकृति। ढूंढते बच्चे खुशहाल... Read more
कविता
वाह री कुदरत क्या खूब रची मानव की सुसंरचना कुशाग्र बुद्धि और जीवन से भरी तेरी यह रचना। तरु विटप वल्लरी वन उपवन है,हरित और... Read more
आपदा
कहर ! प्रकृति का या मानव का प्रकृति पर ? कौन निश्चित करेगा ? कौन मरेगा , कौन बचेगा ..? पर्वत खोद कर बेच डाले... Read more