कविता · Reading time: 3 minutes

प्यार

वो लड़की बहुत अच्छी लगती है ।
जो मेरे यादों में बसती है ।
मेरे आँखों की नमी देख …
जो खुद रो पड़ती है ।
जो मेरे हँसने में ..
खुद हँस पड़ती है ।
जिसे में अंतस में समेटे रहता हूँ …
उस बात को बोल देती है ।
वह जो मेरी खुसी में ..
खुद की खुसी जोड़ देती है ।
उससे बातें करना अच्छा लगता है ..
और मेरे दिल को ठण्डक देती है ।
हजारों लाखों में ..
बस वही अच्छा लगती है ।
लेकिन क्यों ?
नहीं जनता ।
उसे में महसूस करता हूँ———
सूरज की लाली में ..
रात काली में ।
पूनम में , अमावस में ..
जल में,थल में ।
पानी की घूँट में ..
दिन रात में ।
भोजन में , भजन में ..
आरती में वन्दना में ।
सोने में उठने में ..
चिड़ियों के चहकने में ।
दिन की कड़क धूप में..
बादलों की छाँव में ।
सब में , शराब में ..
गुलसन में , शबनम में ।
प्रेम में प्रेमी जोड़ों में ..
गुस्से में लड़ाई में ।
पंखे की हवा में .
रोशनदानों में ।
रौशनी में , अँधेरे में …
सुबह सबेरे में ।
फूलों में पत्तें में …
सरोवर झीलों में ।
पानी में , भोजन में ..
किताब की हर शब्द में ।
गम में खुसी में ..
अकेलेपन में , साथ में ।
गीतों की धुन में ..
सरगम की तानों में ।
प्रकृति में , अप्रकृति में ..
सब में समाज में ।
धड़कन में , सांसों में …
हृदय में , रक्त में ।
सावन में , भादो में …
जीने में , मरने में ।
बस यूँ ही महसूस करता हूँ .
में आत्म मिलन की बेला को बेचैन हूँ ।
उस से जब बात करता हूँ ..
मिलने को कहता हूँ तो ……….
वह शर्म से लजा जाती है .
और कंठ से मधुर गाती है ।
अपने सब ख्वाब सुनाती है …
बड़े अरमान हैं बताती है ।
गुस्से से लाल-पीली हो जाती है …
खुद ही रूठती है …
खुद मान जाती है ।
कभी नैनों को भिगोती है …
कभी लबों को हँसती है ।
मुझे भी यों भोला बनना अच्छा लगता है …
क्योंकि तुम्हारी हर अदा मुझे भाँति है ।
कभी यादों को बाराती बना लाती है ….
कभी मुझे सब ..
कभी अंजाना बना देती है ।
कभी गुस्से से गालों का रंग ..
लाल बना देती है ..
कभी गुलाब पंख से होंठों को ..
हिलती है ।
कभी बोलने को कहती है …
कभी चुप रहने को कहती है ।
जब में थक कर सो जाता हूँ तो …
एक गुनगुनी लोरी सुना कर सुला देती है ।
जब देर सुबह तक नहीं उठता हूँ तो ..
एक एहसाह बन कर मुझे उठती है ।
मैं गिरता हूँ तो ..
मुझे हर बार उठती है ..
इस पागल लड़के को समझती है .।
तब लगता है कोई तो अपना है …
जो हाल – ए – दिल पूछता है ।
मैं ढूढ़ता हूँ कई बार तुमको ….
पहली बारिश की बूँद में …
हवा के ठन्डे झोंकों में ।
फ़ोन की रिंग ट्यून में ..
मैसेज की घंटी में ।
फेसबुक के गलियोरों में …
व्हाट्सऐप के मैसेज में ।
कभी खुद में ..
कभी दूसरों में ।
उसी की बातों में ..
उस जैसे लड़की में ।
सुबह , दोपहर , दिन में …
अंजाने लोगों में ।
पतझड़ में कोपल में ..
बस ढूढ़ता हूँ ।
वो एक अहसास है मेरा ,..
और नहीं जनता की क्या रिश्ता है मेरा उस से ?
बस खोने का मन करता है …
उस में हर सीमा को लांघकर ।
बस ये अहसास ना टूटे ..
ये रिश्ता ना टूटे ,
मैं जी लूंगा इन यादों के सहारे ..
बस तेरा दिल ना टूटे ।।

चंद्र प्रकाश बहुगुना / पंकज / माणिक्य

54 Views
Like
23 Posts · 1.9k Views
You may also like:
Loading...