.
Skip to content

“प्यार सिखाते हैं”

Shri Bhagwan Bawwa

Shri Bhagwan Bawwa

गज़ल/गीतिका

October 22, 2016

हम ज़िन्दगियों को बनाने का काम करते हैं,
प्यार सिखाते हैं,नफरतों को तमाम करते हैं !
शहर में , सहमा हुआ है हर एक आदमी,
चलो,गले मिल आयें सबके घर चलते हैं !
तेरी हुकूमत में, ये क्या क्या हो रहा है ,
रोज कई सूरज उगने से पहले ही ढलते हैं !
उनको मालूम नहीं है, वो अन्जान हैं “श्री”,
रोशनी के लिए,हम रोज शमां बन जलते हैं !

Author
Recommended Posts
हम अपना भार उठाते है
हम अपना भार उठाते है जीवन की गाडी ठीक नही पर उसे रोज बनाते है | कभी दाल भात मिल जाता है कभी सूखी रोटी... Read more
ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम )
ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम ) सुबह सुबह अफ़रा तफ़री में फ़ास्ट फ़ूड दे देती माँ तुम टीचर क्या क्या देती ताने , मम्मी... Read more
कुछ  रोज़ का बहकना है और  दवा  क्या है
कुछ रोज़ का बहकना है और दवा क्या है बीमार- ए- इश्क़ बता तेरा मशवरा क्या है ग़लत बयानियाँ तिरी कहानी ख़त्म कर गईं हम... Read more
हम कौन है ? //कविता
सवाल तो आज खुद से करना है हम कौन है ? क्या है ? और यहाँ किसलिए है ! शायद जवाब ढूँढने में कितना वक्त... Read more