कविता · Reading time: 1 minute

प्यारा गणतंत्र मुबारक हो

सन् सैंतालिस में हम सब हो गए स्वतंत्र मुबारक हो
छब्बीस जनवरी बना गई प्यारा गणतंत्र मुबारक हो

आजादी के बाद बीच जन गहरी-गहरी खाँई थी
सब कुछ तितर-बितर था पर उम्मीद की बदली छाई थी

क्या अनुचित है और उचित क्या समझ नहीं कुछ आता था
अपने मन की करते थे सब जो भी जिसको भाता था

अंग्रेजों के नियमों की जनता अनुगामी बनी रही
दैहिक हुए स्वतंत्र मगर मानसिक गुलामी बनी रही

तब राजेन्दर बाबू ने आगे बढ़कर अगुवाई की
अपना नियम बनाने को नन्हीं सी ज्योति जलाई थी

कानून देश का अपना हो ताकि सब सीना तान चलें
संविधान के पीछे अपना सारा हिन्दुस्तान चले

नेहरू,पटेल,कृपलानि,अयंगर,मुंशी ने देखीभाली थी
प्रारूप समिति का मुखिया बन बाबा ने कमान सँभाली थी

भीमराव इस मुल्क की खातिर सारी रस्में तोड़ चले
अपना सारा ज्ञान अलौकिक संविधान में निचोड़ चले

अंग्रेजी सब नियम जलाकर दूर किया हर क्लेश को
छब्बीस नवम्बर उनन्चास को सौंप दिया इस देश को

संजोए है एक लचीलापन और वृहद् विशाल है
संविधान है लिखित हमारा दुनिया भर में मिसाल है

संविधान के दृष्टिकोण से सारे लोग समान है
जाति,धर्म,भाषा हो कोई सबका हिन्दुस्तान है

छब्बीस जनवरी लागू हो गया सन् उन्नीस पचास था
छूट गयी मानसिक गुलामी मौका अद्भुत खास था

पूरी आजादी का नारा गूँजा हिन्दुस्तान से
लाल किले पर लहराया उन्मुक्त तिरंगा शान से

सुखी रहे हर जीव-जन्तु हम ऐसा मंत्र जगाते हैं
तब से हर छब्बीस जनवरी को गणतंत्र मनाते है

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