कविता · Reading time: 1 minute

प्याज पर दोहे

प्याज पर दोहे
प्याज ब्याज पर हैं मिलें,हुआ विकास महान
प्याज रत्न अनमोल है, भाव छुए आसमान

सेब हुए हैं प्याज समान,प्याज समान हैं सेब
प्याज पहुँच बाहर हुए ,खाली हुईं सब जेब

पड़ोसिन आई मांगने , दे दो हमें दो प्याज
झूठ बोल टरका दिया , अभी नहीं हैं प्याज

वक्त देखो बदल है गया ,बदल दिए हैं रिवाज
भात में भी हैं धर दिए,एक दो क्विंटल प्याज

पावभर अब तुलवा रहे,जो धड़ी लेते थे प्याज
सलाद में नहीं काटते , मंहगे हुए हैं प्याज

अतिथि सत्कार सीमित हैं , दरकिनार है प्याज
प्याज बिना सलाद खांए,सब्जी भी बिना प्याज

सब्जी मंडी मैं पहुँचा , खरीदने धड़ी प्याज
डालर सा प्याज दर सुन,घर आया बिन प्याज

पत्नी बोली अधिकार से,घर लाओ तुम प्याज
सरकारी आदेश यही, अब नहीं खाने प्याज

-सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी रा़ वाली (कैथल)-9896872258

1 Like · 120 Views
Like
You may also like:
Loading...