पॉलिथीन का नाम ज़हर है

पॉलीथिन के विरोध में मेरी एक स्वरचित कविता

पॉलीथिन है घातक इतनी,
इसका दूसरा नाम ज़हर है।
कोई न इससे बच पाया है,
इससे प्रभावित गांव शहर है।।1।।

है फैलती ये घोर प्रदूषण,
इससे भरे तालाब नहर है।
घण्टे मिनट सेकंड ही नहीं,
इसका आवरण चारो पहर है।।2।।

कचरा भरकर इसे फेंकता,
मानव पशु से भी बदतर है।
भोजन समझ इसे ही खाते,
पशुओं पर ढाया कहर है।।3।।

चारो तरफ फैलीे मुसीबत,
कैसा ये छाया मंज़र है।
उससे डरो पॉलीथिन वालों,
ईश्वर की तुमपर नज़र है।।4।।

_अपील_
*मानवता और पर्यावरण में*
*पॉलीथिन है एक अभिषाप*
*प्राकृतिक साधन ही अपनाओ*
*न करना तुम ऐसा पाप*

स्वरचित कविता
तरुण सिंह पवार

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साहित्य समाज का दर्पण होता है इसी दर्पण में भिन्न भिन्न प्रतिबिम्ब दिखाई देते है...
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