.
Skip to content

पैसे का मोल

वेदप्रकाश रौशन

वेदप्रकाश रौशन

कविता

July 7, 2017

पैसा,वाह रे पैसा !
लोग पुछते नहीं है हाल, बेहाल होने पर
गैर भी कूद आते है, पास में माल होने पर ।
मित्रता-शत्रुता पैसे का सब खेल है
दिल से दिल का ना कभी इसमें मेल है।
पैसा,वाह रे पैसा…..।।2

पैसा,वाह रे पैसा !
तू ज़िन्दगी जीना सिखाती है,
हँसना रोना सिखाती है।
खेद बयां करूँ अपना किसी को,
उसका तो पहचान कराती है।

पैसा,वाह रे पैसा !
अपनों-परायों का रंग बताती है,
रिश्तों का भी पहचान कराती है।
गज़ब तेरा खेल है,
तू नहीं तो न प्रेम,न मेल है।

पैसा,वाह रे पैसा !
अकसर लोग ईमान भूल जाते है तुझे पाने में ,
रिश्तों को भी नहीं छोड़ते हैं आज़माने में ।
हम कुछ भी कर लें सम्मान पाने में,
लोग नहीं भूलते अपमान कराने में।
पैसा,वाह रे पैसा….!!2

–वेदप्रकाश रौशन

Author
वेदप्रकाश रौशन
हिंदी का उपासक, सहित्य प्रेमी । सांस्कृतिक बचाव के लिए एक छुपा हुआ छोटा सा कलम का पूजारी । विभिन्न विधाओं में रूचि के अनुसार लेखन करता हूँ । लेख तथा कहानी विशेष तौर से लिखना पसंद करता हूँ ।।
Recommended Posts
कटुसत्य
चमक भी पैसा दमक भी पैसा आटा भी पैसा नमक भी पैसा नाम भी पैसा काम भी पैसा तीर्थ भी पैसा धाम भी पैसा रूप... Read more
वाह ! मेरा देश किधर जा रहा है ।
वाह ! मेरा देश किधर जा रहा है । आदमी की चादर है आधी , पैर दुगुने पसार रहा है । वाह ! मेरा देश... Read more
दो दिन का मेहमान है
पैसा ही पैसा इस जग मे, पैसा ही तो शान है| तू क्यो इतराता इतना, दो दिन का मेहमान है|| नोट बंदी पर इक कविता,... Read more
***  मन का पंछी **
?मन का पंछी उड़ ना जाये रे बडी भौर हुई मन दिल को ये समझाये बन्ध पिंजरे में पंछी रे कैसे उड़ ये पाये रे... Read more