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पूस की इस चांदनी रात

पूस की इस चांदनी रात
तुम चलोगी
कुछ दूर साथ?
जवानी के जिस रस्ते पर
मै चल रहा था
वो मुझे सपने में ले जा रहा था
मेरे पास साहस नहीं था
ये सवाल तुमसे पूछने का
तुम चलोगी
कुछ दूर साथ?

तुमने मुझे देखा,
मैंने तुम्हे देखा
मेरे चेहरे पर डर था
तुमसे दुबारा न मिल सकने का
मै तुम्हारे नाक पर
बने उस तिल को देखता रहा
गहरा और विराट
तुम्हारे मखमली
सफ़ेद सूट को देखता रहा
पूस की इस चांदनी रात
पर पूछ न सका
तुम चलोगी
कुछ दूर साथ?
मै भी नहीं बोला तुमसे
हम शायद हैरान थे
पूस की इस चांदनी रात
क्योंकि,चल पड़े थे
कुछ दूर साथ..
रात बहुत हो चुकी थी
ज़िन्दगी को जी रहे थे
तुम्हे मुझसे प्यार हो गया
बस इस रात
तो मान लो मेरी बात
चलते रहो साथ-साथ
कुछ दूर साथ
मै देखता रहूँ
तुम्हारे नाक के कोमल काले तिल को
और चलता रहूँ
तुम्हारे साथ…
दिन,सप्ताह,
माह,साल,
हज़ार साल…
कुछ दूर साथ…..

सुनील पुष्करणा

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