संग-संग लाकडाउन मनाते ( हास्य )

( व्यथा एक कुंवारे की )
सुन रे कोरोना !
ठहर जाता ग़र महीना दो महीना
क्या बिगाड़ हो जाता तेरा
मुझसे क्या कोई दुश्मनी थी
जो चला आया
बना बनाया खेल बिगाड़ने
अरे पाजी ! तुझे क्या पता
कितनी मुश्किल से
रिश्ता हुआ था
मेरे मन ने उसके मन को छुआ था
इतने में तू आ गया
सबको भरमा गया
अरे विघ्न संतोषी !
क्या मिल गया तुझे
परेशान करने में मुझे
मेरी पूरी तैयारी थी
हाय वो कितनी प्यारी थी
अरे दुष्ट ! तुझसे क्या
किसी की खुशी देखी नहीं जाती
जो तूने बीच में ही
सब गुड़ गोबर कर दिया
मेरी झोली में
खुशी से पहले ही ग़म भर दिया
लगता है तू ज़रूर
उसका कोई पूर्व प्रेमी है
तभी तो
इतना भयानक बदला लिया है
मेरे अरमानों के हनीमून का
बेदर्दी से खून किया है
अरे बेदर्द !
कितने दिनों में तो
ये हसीन घड़ी आई थी
बड़ी मुश्किल से
दिल को कोई भायी थी
अरे कितनी तैयारी थी
किस किस को एडवांस दिया था
सब धरा का धरा रह गया
बैंड ,घोड़ी , फूल, गजरा
शादी मंडप का महल ढह गया
अरे क़ातिल !
तेरा ऐसा भयानक डंक हो गया
मैं दूल्हे राजा बनते बनते रंक हो गया
अरे इतना तो वक्त देता
कि हम घोड़ी चढ़ जाते
और
संग-संग लाकडाउन मनाते ।

अशोक सोनी

1 Like · 4 Comments · 12 Views
पढ़ने-लिखने में रुचि है स्तरीय पढ़ना और लिखना अच्छा लगता है साहित्य सृजन हमारे अंतर्मन...
You may also like: