पूर्णांगिनी

जया को रात में बुखार चढ़ गया था। दो बार उल्टी भी हुई थी। पास सोए रवि को उसने इस बात की भनक भी नहीं पड़ने दी, लेकिन सवेरे वह लाचार थी। वह रवि से बोली, “सुनिए, मुझे बुखार है और कमज़ोरी लग रही है। बिट्टू को तैयार कर के स्कूल भेज देंगे? बस साढ़े सात पर आती है।”
रवि हड़बड़ा के उठा। उसके पास एक घंटा था। सबसे पहले बिट्टू को जगाया, और चाय का पानी चढ़ाया। सोचा जया का बुखार ही नाप लूँ। एक सौ पाँच डिग्री देख कर वह घबड़ा गया। फ़ौरन ही दो बिस्कुट के साथ पैरासिटेमॉल की एक गोली जया को दी।
उधर बिट्टू दोबारा सो गया था। उसे उठा कर एक झापड़ रसीद किया तो वह रोने लगा। रवि उसे पुचकारने लगा, “बेटा, रोते नहीं… मम्मी की तबियत ख़राब है… आज मैं ही तुम्हें तैयार करूँगा। तुम क्या खा कर जाते हो और टिफ़िन में क्या ले जाते हो?”
बिट्टू था तो छोटा ही, लेकिन मम्मी की बीमारी की बात सुन कर सँभल गया। बोला, “मम्मी तो कभी टोस्ट बटर देती हैं और कभी आलू का पराँठा। लेकिन मम्मी को हुआ क्या है?”
“बुखार हो गया है,” रवि बोला। चाय का पानी उबल-उबल कर आधा हो गया था। जब तक बिट्टू तैयार होता, उसे नाश्ता व टिफ़िन दोनों तैयार करना था। पराँठे तो रवि क्या बनाता, टोस्टर में ब्रेड के स्लाइस लगा कर मक्खन का डिब्बा ढूँढने लगा।
“पापा, मेरे जूते पॉलिश नहीं है,” कमरे से बिट्टू की आवाज़ आई। रवि सब छोड़ कर जूते में पॉलिश करने लगा। तब तक टोस्ट जल गया। रवि झल्ला गया।
जब तक रवि दोबारा टोस्ट बना कर बिट्टू को तैयार करता, बाहर बस का हॉर्न दूसरी बार बज गया। भागते हुए बाहर पहुँचा तो बस जा चुकी थी। रवि रुआँसा हो गया।
भाग्य से पड़ोस के शर्मा जी का बच्चा भी लेट हो गया था और वह उसे छोड़ने कार से जा रहे थे। बिट्टू को भी शर्मा जी के साथ भेज कर रवि ने चैन की साँस ली।
इन चक्करों में रवि ने अभी तक चाय भी नहीं पी थी, और उसे स्वयं एक घंटे में ऑफ़िस के लिए निकलना था। जया के लिए डॉक्टर को कंसल्ट भी करना था। कॉलोनी में ही एक डॉक्टर थे, उन्हें घर पर बुला लिया। जया के ऑफ़िस में छुट्टी की अर्ज़ी भी भेजनी थी। रवि अपना सिर पकड़. कर बैठ गया।
उसे याद आया कि चार महीने पहले उसकी तबियत भी ख़राब हुई थी। उस समय जया ने इतना सब कैसे किया होगा?
कहने को तो जया उसकी अर्धांगिनी थी लेकिन उसे लग रहा था कि वह ख़ुद जया के बिना शून्य है, और जया वास्तव में उसकी पूर्णांगिनी है

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