कविता · Reading time: 1 minute

पूनम का चाँद

पूनम का चांद चांदनी विखराता
मोती सदृश छिटक कर नभ भाता
तारे छिपा छिपी कर टिमटिम करते
शून्य गगन मे अपनी आभा से रंग भरते
कौन प्रकाश देता है चंदा को छिपकर
पाकर आभा किसकी बनता है रजनीकर
सीख मिलेगी सही दान की देखो दिनकर
कौन जानता देता है प्रकाश भाष्कर
विन्ध्य सा ऊंचा उज्ज्वल तब बनता है हिमकर
विन्ध्यप्रकाश मिश्र

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