पूजा की थाली तुलसी का पत्ता हैं माँ...!!!

एक इबादत एक दुआ हैं माँ,
मेरी सारी मन्नते मेरा ख़ुदा है माँ,

हार जाती हैं जमाने भर की मुश्किले
हर उलझन को आसा हैं माँ,

क्यो सफ़ेद चादर तूने ओढ़ ली
अब्बा के बाद तुझे क्या हुआ हैं माँ,

पुरानी खटिया सी कोने पे लेती हुयी,
सिरहाने एक पीतल लोटा मोटा चश्मा है माँ,

दो आँख झुर्रियों से टकी लगायें रखे,
घर के हर शख्श के लिये परेशा हैं माँ,

ख़ास-खास कर जब कोई रात सो ना सके,
गुनगुना पानी और मुलेठी का टुकड़ा है माँ,

चार-आने आठ-आने के शहंशाह थे हम,
पापा से लड़कर दिलाती,वो छुट्टा हैं माँ,

तीज़ त्योहार रश्मो रिवाज़ की गठरी,
पूजा की थाली तुलसी का पत्ता हैं माँ,

चिता की आग़ मे जब रोशनी जल गयीं,
पता बहुत चला कि क्या है माँ,

तू तो कहती थी मरकर सितारा बनुगी
चाँद से पूछता रह गया काहाँ हैं माँ,

डॉ.जफ़र ऐरोली
बागेश्वर
उत्तराखंड

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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