पुस्तक समीक्षा - अंतर्मन की पीड़ा - डॉ. राधा वाल्मीकि, समीक्षक आर. डी. आनंद।

मेरा सपना मेरा अंतर्मन है

(अंतर्मन की पीड़ा- डॉ. राधा वाल्मीकि की समीक्षा)

डॉ. राधा वाल्मीकि पंतनगर इंटर कॉलेज में इतिहास की प्रवक्ता हैं। बहुत ही फ़क्र होता है यह कहने, सुनने और लिखने में कि वह अलग-अलग पाँच विषयों-राजनीतिशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और शिक्षाशात्र-में एम.ए. हैं। इतना ही नहीं, बीएड, एलएलबी और पीएचडी के साथ हिमालय बुड बैज में स्काउटिंग भी किया है। 2019 में रवीना प्रकाशन, दिल्ली ने इनका काव्य संकलन “अंतर्मन की पीड़ा” भी साया किया है। 108 पृष्ठ में कुल 55 कविताएँ अपना विस्तार लिए हुए सुभायमान हैं। ख्यातिप्राप्त कवि डॉ. नरेंद्र वाल्मीकि ने बहुत ही सारगर्भित भूमिका लिखा है। कहने को कोई भी कह सकता है कि नरेंद्र अभी नवोदित हैं लेकिन मैंने उनकी कविताओं और बातों में बहुत जबरदस्त परिपक्वता महसूस किया है। उनकी भूमिका पढने के बाद डॉ. राधा वाल्मीकि की कविताओं को पढ़कर यह समझा जा सकता है कि नरेंद्र वाल्मीकि में साहित्य की एक गहरी समझ और कविताओं में अभिरुचि है। कविताओं को पढ़ते समय मैंने एक अनुसूची तैयार किया-जैसे कोई गणित का छात्र प्रमेय सिद्ध करने के लिए रेखाचित्र तैयार करता है और उसके सभी बिंदुओं तथा रेखाओं के नामकरण करते हुए उस पर ए वी सी डी इत्यादि लिखता है। डॉ. राधा वाल्मीकि की कविताओं के प्रमेय में सामान्य प्रेम-प्रीति पर 5 कविताएँ, देश प्रेम पर 7 कविताएँ, सामान्य स्त्री पर 2 कविताएँ, दलित स्त्री पर 1 कविता, गरीबी पर 4 कविताएँ, वाल्मीकि जातियों की समस्या पर 3 कविताएँ, वाल्मीकि जातियों को प्रेरणा पर 2 कविताएँ, व्यभिचार पर 2 कविताएँ, नेता का चरित्र पर 1 कविता, दोगलापन पर 4 कविताएँ, जातिप्रथा पर 1 कविता, भाषा पर 3 कविताएँ, प्रकृति पर 3 कविताएँ, दर्शन पर 8 कविताएँ, नास्टेल्जिया पर 4 कविताएँ, आम्बेडकर पर 1 कविता तथा आह्वान पर 5 कविताओं का खाका तैयार किया है। मेरे सारे विषय लगभग नरेंद्र वाल्मीकि के विषयों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित हैं।

कवि सर्वप्रथम एक सामान्य व्यक्ति ही है। उसके सामने व उसके जीवन में उतनी ही समस्याएँ आती हैं जितनी आम आदमी के जीवन में संभव होता है। सामान्य आदमी भी उतना ही दार्शनिक है जितना एक दार्शनिक व कवि। सामान्य व्यक्ति जीवन, समाज और देश के हर झंझावात को बखूबी समझता है लेकिन न उसके पास परिमार्जित भाषा होती है, न परिशुद्ध विचार और न ही अंकित करने की कोई योजना; इसलिए, वह उन विचारों को लिपिबद्ध नहीं कर पाता है अथवा करता है। एक दार्शनिक जीवन के उथल-पुथल को वैचारिक-मानसिक स्थूलता प्रदान करता है जिसे अनेक छात्र व स्कॉलर अपने अध्ययन-अध्यापन व मनीषी विमर्श में लेता है। कवि उन वैचारिक अवस्थितियों को भाषा, शैली, अलंकार, रस, छंद, मात्रा, व्याकरण, रूप, रंग, कथ्य में कसता हुआ उसकी अंतर्वेदना में अर्थों को समाहित कर देता है जिसे पाठक महसूस करता है तथा उसकी व्याख्या करता है। डॉ. राधा वाल्मीकि एक ऐसी ही दार्शनिक हैं जो कविता में अपने दर्शन को अभीष्ट प्रदान करती हैं। पीड़ा और प्रेम को समझने के लिए किसी विशेष वय की जरूरत नहीं होती है, फिर भी डॉ. राधा वाल्मीकि ने इन विचारों को अपने प्रौढ़ावस्था में निरूपित किया है। उनके एक-एक शब्द उनके जीवन के अनुभव से तप कर निकले हैं। सामान्य रूप में हर व्यक्ति का एक जनक और एक जननी होती है। वे प्राकृतिक तौर पर बच्चे की परवरिश करते हैं। इसमें कोई विशेष नहीं है और यह पशु से लेकर मनुष्यों तक में सदियों-सदियों से होता आया है लेकिन, मनुष्य होने के नाते यह विचार कितना विशेष है कि एक माँ-बाप जोड़े के रूप में अपने जाए को इस दुनिया में कितना खूबसूरत बनाने का उद्यम करते हैं। माँ-बाप के रूप में मनुष्य इस ब्रह्मांड का सबसे उत्तम प्राणी है। यह उत्तम इसलिए भी है कि यह विवेक प्रदत्त प्राणी है। इसमें समझ है। इसमें विश्लेषण की प्रवृत्ति व क्षमता है। माँ-बाप स्वयं बच्चे के गुह-मूत में सोकर उन्हें निर्विघ्न सुख प्रदान करते हैं। यह भी कि वे हमें इस संसार के दर्शन योग्य बनाते हैं। उनकी महति कृपा है कि हम इस अद्भुत संसार में अस्तित्वमान हैं। डॉ. राधा वाल्मीकि ने ठीक ही लिखा है:

वर्णी न जाए माँ की ममता,

टोला न जाए पिता का प्यार।

माता-पिता के चरणों में है,

छिपा हुआ सुख का संसार।।

(माँ की ममता पिता का प्यार, पेज 17)

डॉ. वाल्मीकि की एक कविता है “मोहब्बत” जिसमें एक पैगाम है कि मुहब्बत एक ऐसी शय है जिसे मिटाया नहीं जा सकता है। उन्होंने मुहब्बत को शय क्यों कहा है, आखिर शय क्या है और वह क्यों नहीं मिटाया जा सकता है जबकि हरपल मुहब्बत के दुश्मन मानव विरोधी कार्यों में जुटे हुए हैं। शय एक शक्ति है, ऐसी शक्ति जो सास्वत है। यह शय उस फसाने का रुप नहीं है जो आज है कल नहीं रहेगा। दरअसल, शय एक रूप भी है जिसे शक्ति ग्रहण करती है और रूपवान हो जाती है किंतु यह शय मनुष्य की सकारात्मक चिंतन पद्धति है जिसे परिवर्तन व विनष्ट का कोई खतरा नहीं है। यह शय वह एनर्जी है जो हर वस्तुओं, विचारों, सिद्धांतों, मतों, व्यक्तियों, प्राणियों में आकर्षण के बतौर विद्यमान रहता है। डॉ. राधा की कविता के अंश देखिए:

दुनिया में मुहब्बत से बड़ी शय नहीं कोई,

इस शय को मिटा सकता जमाने में न कोई।

हर धर्म, नस्ल, जाति में रहती है मोहब्बत,

इंसाँ है भाई भाई, ये कहती है मोहब्बत।

मुहब्बत से बड़ा धर्म यहाँ है नहीं कोई,

इस शय को मिटा सकता जमाने में न कोई।

(मुहब्बत, पेज 24)

संग्रह की अगली कविता “प्रसन्नता” में कवि बहुत ही निरपेक्ष चिंतन प्रस्तुत कर रही हैं। प्रसन्नता को कवि ने एक अमूर्त निरपेक्ष तत्व मान लिया है जबकि, संसार कभी भी निरपेक्ष नहीं होता है। हर कार्य का कोई न कोई कारण होता है। यदि दुख का कारण है तो सुख का भी कारण है। यदि खिन्नता का कारण है तो प्रसन्नता का भी कारण है। एक रोता हुआ व्यक्ति उसी क्षण हँस नहीं सकता है। एक सोता हुआ व्यक्ति उसी क्षण जगा हुआ नहीं रह सकता है। कवि स्वयं लिखती है:

प्रेम, शांति, सद्भाव, सरलता से,

हृदय में उपजती है प्रसन्नता।

(प्रसन्नता, पेज 26)

इस प्रसंग को लेकर विमर्श यह है कि प्रसन्नता प्रेम, शान्ति, सद्भाव के माहौल में उत्पन्न होता है लेकिन भारत जातीय विषमता का देश है, भारत शोषक और शिषितों का देश है। यहाँ अवर्ण जातियाँ सवर्ण जातियों से और सर्वहारा शोषकों से प्रताड़ित, उत्पीड़ित, दबाए, कुचले, लतियाये जाते रहे हैं। दलितों और गरीबों के पास न शिक्षा है, न रोजगार है और न जमीन है। ऐसी दशा में वह न प्रसन्न है न प्रसन्नता प्रदान कर सकता है। जो प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं वे सारे सुख सारी प्रसन्नता तिजोरी और विचारों में कैद करके रखे हुए हैं। ऐसी स्थिति में डॉ. राधा वाल्मीकि की इस कविता की विचारधारा सापेक्ष धरातल पर पूर्ण नहीं हो सकती है। अतः यह एक कोरी कल्पना है, आदर्श है। वर्ग-विभाजित समाज में प्रेम, प्रीति, स्नेह, मुहब्बत, खुशी, प्रसन्नता सभी विभाजित हैं। ये सभी को तब तक नशीब नहीं हो सकते हैं जब तक पूँजीवादी-ब्राह्मणवादी विरोधी समाजवादी-आम्बेडकरवादी क्रान्ति स्थापित नहीं हो जाती है। इसी के साथ उनकी कविता “मेरे अरमां मेरे सपने” में न उनके अरमां स्पष्ट है और न उनके सपने ही स्पष्ट हैं। उन्होंने अपने सपने को अपने मस्तिष्क में कैद रखा है, उसे कविताओं के माध्यम से हम पाठकों के सम्मुख नहीं प्रस्तुत किया है। सपने व्यक्ति में पैदा होते हैं लेकिन सपनों को न व्यक्ति में केंद्रित होना चाहिए और न सपनों को व्यक्तिवादी ही होना चाहिए। साहित्यकारों में अक्सर प्रतिबद्धताओं को लेकर गरमा-गरम बहस होता है। अनेक विद्वानों का मत है प्रतिबद्धताएं कविताओं के रूप को बिगाड़ देती हैं इसलिए कवि को बहुत ही स्वतंत्र होकर रचनाएँ देना चाहिए। स्वतंत्र रचनाओं में इसी तरह की अड़चने आती हैं कि कवि के सपने क्या हैं, कवि के अरमान क्या हैं- स्पष्ट नहीं होता है। फिर यहाँ तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है कि व्यक्ति के अपने बहुत सारे निजी अरमां और सपने होते हैं वह उन्हें जनमत के लिए स्पष्ट क्यों करे लेकिन हम यही यह भूल जारे हैं कि एक कवि के लिए कोई भी विचार व्यक्तिगत तब तक है जब तक वह लेखनीबद्ध होकर प्रकाशित नहीं हो जाता है। जब विचार सामाजिक हो गया तब वह सामाजिक प्रॉपर्टी है। फिर कोई ऐसा विचार जिस पर एक खाका ही न तैयार किया जा सके, उसका क्या मतकब, क्या अर्थ है। प्रतिबद्धताएं यह सुनियोजित करती हैं कि वह पार्टनर किसका है। उन्होंने लिखा है:

सपने जो संजोए पलकों में,

कभी उनको निखरना ही होगा।

अरमां जो पिरोए हैं दिल में,

कभी उनको संवरना ही होगा।।

(मेरे अरमां मेरे सपने, पेज 28)

सार्वभौम की दो शक्तियाँ-सकारात्मक और नकारात्मक-अनवरत विद्यमान हैं। स्त्री और पुरुष को भी इन्हीं दो शक्तियों का द्वेतक माना गया है। जब तक ये शक्तियां पदार्थ के अस्तित्व में है अथवा प्राणी में विवेकहीनता की स्थिति में हैं तब तक कहीं कोई खतरा या मूल्य हीनता नहीं दिखाई पड़ती है। सब कुछ एक पद्धति का अनुसरण करते हैं लेकिन जैसे ही प्राणी चेतनशील मनुष्य बना, वैसे ही स्त्रियों का शोषण-बलात्कार प्रारम्भ हो गया। स्त्रियाँ अपने ही अर्द्ध से डरने लगीं। स्त्रियों को अपने ही सार्वभौमिक तत्व के विवेक से खतरा उत्पन्न हो गया। स्त्रियाँ जिसे पैदा करती हैं, जिसका लालन-पालन करती हैं, जिसकी अंकशायिनी बनती हैं, जिसके कामक्रिया को रतिक्रिया से तृप्त करती हैं, जिसका भोजन पकाती हैं, जिसके लिए सजती हैं, जिसकी हमसफर बनती हैं, जिसकी माँ हैं, जिसकी बहन हैं, जिसकी बेटी हैं, जिसकी अर्धांगिनी हैं; वही पुरुष उसका बलात्कार करता है, वही पुरुष उसकी अस्मिताओं का मर्दन करता है, वही पुरुष स्त्री को नरक का द्वार कहता है, वही पुरुष स्त्री को नागिन कहता है, वही पुरुष स्त्री के अंगों-प्रत्यंगों का व्यापार करता है, वही पुरुष स्त्री को दोयम दर्जे का अपाहिज नागरिक बनाकर रखता है, वही पुरुष उसे पाप की खान कहता है। स्त्रियाँ अपने ही बेस्ट हाप पार्ट से हर तरह अमर्यादित रहती हैं। इस संग्रह में स्त्री से संबंधित तीन कविताएँ हैं। दो स्त्रियों की सामान्य दशाओं पर लिखी गई हैं तथा तीसरी दलित स्त्री से संबंधित है।

पहली कविता “बेटियों का अस्तित्व” में उनके अस्तित्व की बात करती हुई लिखती हैं कि पुरुष मानव से दानव कब बन बैठा-पता ही नहीं चला। कब उसमें पशुता आ गया-यह सोचकर परेशान हूँ। वे कहती हैं कि पुरुष व्यभिचारी हो गया है। वह क्रूर, कलुषित, दुर्व्यवहारी हो गया है। वह रिश्ते-नाते तोड़कर अमर्यादित हो उठा है। वह मासूम बच्चियों तक की अस्मत को लूट रहा है, उनके बचपन को रौंद रहा है। आज सामाजिक, राजनैतिक और न्यायिक व्यवस्था अपंग और लाचार हो चुकी है। यथा:

मानव कब दानव बन बैठा,

सोच – सोच हैरान हूँ मैं।

पशुता का पोषक बन बैठा,

देख – देख परेशान हूँ मैं।

(बेटियों का अस्तित्व, पेज 33)

दूसरी कविता “परी हूँ मैं” में वे एक स्त्री होंने के नाते स्वयं के असुरक्षा की बात लिखती हैं। स्त्री स्त्री है-चाहे वे स्वयं हो चाहे कोई और-असुरक्षा का बोध हर तरफ सताता है। ऐसी कविताएँ स्त्री के द्वंद्व को समझने में सहयोग करती हैं। एक तरफ जहाँ वह पिता की प्यारी हैं वहीं वही दूसरी तरफ दूसरे पिता से डरी हुई भी हैं। दोनों पुरुष हैं। एक तरह उसी पुरुष प्रधानता के पक्ष में हैं और पाप व न्याय के पुरुष अहमन्यता की शिकार हैं। दूसरी तरफ भी पुरुष है और वह पुरुष सिर्फ पुरुष है तथा अन्यायी होने की पूरी संभावना भी है। उस पुरुष से खतरे हैं। यहाँ स्त्री विमर्श के सरोकार से जुड़े सभी स्त्री-पुरुष को यह बात जहन में बैठा लेना चाहिए कि एक स्त्री का बाप दूसरी स्त्री का बलात्कारी है अथवा उसमें बलात्कार करने की पूरी संभावना है। एक पिता पुरुष है और उसमें पुरुष प्रधानता के सभी अवगुण होंगे। ऐसी स्थिति में क्या आप का बाप, क्या आप का भाई, क्या आप का बेटा, क्या आप का पति, क्या आप का ताऊ! इसलिए जब स्त्रियाँ पिता, पति व पुत्र के मोह में फँसती हैं तो अनायास-अनजाने ही पुरुष सत्ता के अवगुणों को स्वीकार लेती हैं। अक्सर, एक स्त्री पिता को नैतिक पुरुष मान लेती है और ऐसा संबोधित करती है जैसे उसका पिता दूध का धुला हो और वह किसी स्त्री को अपवित्र भाव से देख ही नहीं सकता है। उदाहरण के लिए कविता की इन पंक्तियों में एक स्त्री का पिता के प्रति भाव को देखा जा सकता है:

पर डरती हूँ घर से बाहर,

जब मैं कदम बढ़ाऊँगी।

जाने कितनी गंदी नजरों में,

मैं, पापा! चढ़ जाउँगी।।

(परी हूँ मैं, पेज 39)

दरअसल, पुरुष प्राधानताबोध और पुरुष में अंतर करना होगा। नारीवाद के चिंतन में हर पुरुष अपराधी है। इस चिंतन पद्धति को विमर्श द्वारा परिशुद्ध करना होगा तथा पुरुष प्रधानता के दोष को दूर करने के लिए उसकी सत्ता से लड़ना होगा। आखिर, क्या कारण है कि गैर स्त्री को गैर पुरुष से डर लगता है या गैर पुरुष गैर स्त्री की अस्मत के साथ खिलवाड़ करता है? पुरुष सत्ता के उस भौतिक परिस्थिति को खत्म कर दिया जाय तो पुरुष कहीं भी हमलावर नहीं होगा।

तीसरी कविता “ये दलित की बेटी है” में स्त्री का शोषक सवर्ण (ब्राह्मणवाद) है। यहाँ स्त्री का दूसरा रूप है। यहाँ स्त्री का सारा डर ब्राह्मणवादी सवर्ण पुरुष से है। यहाँ दलित साहित्य का दलित दृष्टिकोण है। इस कविता के माध्यम से दलित स्त्री के शोषण पर एक लम्बा विमर्श उपस्थित है। सर्वप्रथम दलित स्त्री भी एक स्त्री ही है और सवर्ण पुरुष पुरूष है। यहाँ दलित स्त्री सिर्फ दलित स्त्री होने के कारण सवर्ण पुरुषों द्वारा उत्पीड़ित, प्रताड़ित, शोषित और बलात्कृत नहीं है बल्कि वह आर्थिक रूप से विपन्न व कमजोर है इसलिए सामाजिक रूप से पिछड़ी है। किसी भी सम्पन्न व सुशिक्षित दलित स्त्री का बलात्कार शून्य के बराबर है। किसी भी सम्पन्न व सुशिक्षित दलित स्त्री न निरीह है, डरी हुई है, न प्रताड़ित है, न अबला है, न नगर बधू है, न देवदासी है, न वेश्या है, न भोग्या है, न मर्दन होता है और न शोषित है। ये सारी स्थितियाँ उस दलित स्त्री की है जो गरीब है, अशिक्षित है, भूमिहीन है, बेरोजगार है, मजदूर है, मजलूम है, और सर्वहारा है। कुदृष्टि की शिकार दलित स्त्री भी है और सवर्ण स्त्री भी है। सवर्ण स्त्रियाँ सवर्ण पुरुषों के साथ-साथ शूद्र जाति के पुरुषों की भी शिकार हैं, उनकी भी कुदृष्टि स्त्रियों पर पड़ती हैं। दूसरी बात, दलित स्त्रियाँ दलित पुरुसजों के द्वारा उतनी ही शोषित है जितना कोई सवर्ण स्त्री सवर्ण पुरुष द्वारा शोषित होती है। हाँ, दलित स्त्री दलित पुरुषों की तरह सवर्ण के ऊंच-नीच, छुआ-छूत, गैर-बराबरी की भावना के समरूप शिकार हैं। अक्सर, स्त्रियों के ऊपर शोषण और जुल्म के मामले में दलित स्त्री और सवर्ण स्त्री कहकर स्त्रियों की एकता को तोड़ा जाता है जिससे अलग-अलग उनका शोषण-उत्पीड़न आसान बना रहे क्योकि ऐसी स्थिति में सवर्ण और दलित पुरुष भी अपनी-अपनी स्त्री के मामले में अलग-अलग खड़े होंगे बल्कि जातिवाद की ऐसी मानसिकता के कारण विपरीत जाति व उसकी स्त्री पर हुए बलात्कार व हत्या पर एक दूसरे को मज़ा आता है। इस अर्थ में यह कविता सिर्फ इतना अर्थ ग्रहण कर सकने में सक्षम है कि प्राचीन समय में दलित स्त्रियों के साथ सवर्ण पुरुषों ने जघन्य रूप से शारीरिक व मानसिक शोषण किया है। वैसे यह सही है कि दलित जातियाँ सामाजिक संरचना के कारण अत्यधिक गरीब रही हैं। एक हद तक दलित जातियाँ खानाबदोश रही हैं। ये जातियाँ सामाजिक, आर्थिक, राजनीति व न्यायिक व्यवस्था के हितों से दूर रखी गई थीं, अतः इनके साथ सवर्ण जातियाँ जो चाहती थीं, जैसा चाहती थीं-करती रही हैं। उसका एक वीभत्स उदाहरण इस कविता से उभर कर आता है:

नहला-धुला कर शुद्धिकरण कर,

इसका मर्दन होता था।

घर का मालिक बेबसी पर,

खून के आँसू रोता था।

(ये दलित की बेटी है, पेज 36)

भारतीय जाति-व्यवस्था में गरीब, अशिक्षित, भूमिहीन और संसाधन विहीन बनाए जाने के कारण शूद्र जातियाँ प्रतिरोध की क्षमता से हमेशा महरूम रही हैं। इसी के कारण दलित जातियाँ न्यायिक प्रक्रिया और पहुँच से दूर रही हैं। जिसके कारण सवर्णों ने दलितों और उनकी स्त्रियों पर बहुत ही अन्याय किया है। दलित स्त्रियों को देवदासी ब्राह्मणवादी सवर्णों ने बनाया। स्तन खुला रखने का आदेश सवर्णों ने दिया। नव-विवाहित दलित स्त्री की डोली सर्वप्रथम सवर्णों के घर जाएगी और कम से कम तीन दिन या उनकी इच्छा के अनुसार रात में उनकी रखैल और दिन में दासी के रूप में रहेगी-का नियम ब्राह्मणों ने बनाया। ऐसी स्थितियों को जानकर खून खौलना वाजिब है लेकिन फिर भी यह लड़ाई किसी जाति (सवर्ण) से नहीं, एक व्यवस्था से है क्योंकि वह व्यवस्था ही इनकी जलील मानसिकता की नियमावली बनाकर इन्हें सशक्त करता है। डॉ. राधा वाल्मीकि की यह कविता दृष्टव्य है:

ढकने न पाए यौवन इनका,

बना दिए गए ऐसे विधान।

देना पड़ता था कर इनको,

स्तन आकृति के समान।।

नाव-विवाहिता की डोली,

घर से जब उठ जाती थी।

पहले गाँव के मुखिया की,

ड्योढ़ी पे उतारी जाती थी।।

तीन दिनों तक उंसके घर में,

रात बितानी होती थी।

तब कहीं जाकर वो अपने,

पति के द्वार पहुँचती थी।।

(ये दलित की बेटी है, पेज 37)

जातीय व्यवस्था वर्चस्ववादी व्यवस्था है। इस व्यवस्था का संचालक अपने अधीनस्थ जनता से शिक्षा, रोजगार, धन, भूमि और संसाधन के मालिकाने को छीनता है। संसाधनों के मालिकाने को छीनने के लिए नियम चाहिए। नियम के लिए कानून चाहिए। कानून के लिए सरकार चाहिए। सरकार के लिए सत्ता चाहिए। सत्ता से व्यवस्था मजबूत हो सकती है और बहुसंख्य जनता को सेवक बनाया जा सकता है। इन वर्चस्ववादियों ने एनकेनप्रकारेण हमेशा सत्ता के इर्द-गिर्द अपना घेरा बनाया। सत्ता में दखल रखा। व्यवस्था को नियंत्रित किया। और, आज भी ये वही कर रहे हैं। इनका फंडा कल भी शिक्षा और संसाधनों पर कब्जा था और इनका फंडा आज भी शिक्षा और संसाधनों पर कब्जा है। शिक्षा, धन और संसाधन की वजह से सवर्ण सवर्ण (उँच) हैं और शिक्षा, धन तथा संसाधनों के ही अभाव में अवर्ण अवर्ण (दलित या शूद्र) है। जिसे हम सामाजिक व्यवस्था कहते हैं, जिसको हम ब्राह्मणवाद कहते हैं, वास्तव में वह शिक्षा, धन व संसाधनों पर कब्जे की व्यवस्था है। हम हमेशा लकीर पीटते हैं, साँप नहीं। हम हमेशा ब्राह्मणवाद के नाम पर ब्राह्मणों के विरुद्ध आवाज उठाते हैं जबकि हमें शिक्षा, जमीन और संसाधनों के वितरण की लड़ाई लड़ना चाहिए। वैसे भी डॉ. राधा वाल्मीकि अपनी कविता “दरिंदों का कोई मजहब नहीं होता” में कहती हैं कि दरिंदों की न कोई जाति होती है न कोई धर्म होता है। दरिंदे हैवान है, अमानुष हैं। जिनमें इंसानियत बिल्कुल नहीं होती है। इस कविता की दो पंक्तियाँ उद्धृत करने लायक है:

वहशी दरिंदों का कोई मजहब कोई जाति नहीं होती।

इनमें इंसानियत की कोई बात नहीं होती।।

(दरिंदों का कोई मजहब नहीं होता, पेज 108

समकालीनता का अर्थ बहुत ही व्यापक है। जहाँ देश प्रेम पर कविताएँ हैं, गरीबी पर कविताएँ हैं, शिक्षा पर कविताएँ हैं, जातिवाद पर कविताएँ हैं, स्त्री शोषण पर कविताएँ हैं, दलित स्त्री पर ब्राह्मणवादी शोषण व अत्याचार की कविताएँ हैं, बलात्कार पर कविताएँ हैं, वाल्मीकि जातियों के कार्यों पर कविताएँ हैं, वहीं नेताओं के छल-छद्म, मुखौटे, दोगलेपन पर भी कविताएँ हैं। “मुखौटा” कविता ऐसे ही नेताओं पर लिखी कविता है। “संभल जाओ” कविता में वे नेताओं द्वारा बेवजह प्रायोजित हड़ताल को रोक देने की सलाह देती हैं। वे कहती हैं कि बेवजह प्रायोजित हड़ताल से न जाने कितनी जिंदगियाँ बेहाल हो जाती हैं, लोगों की उस दिन रोजी-रोटी छिन जाती है, बीमार की तीमारदारी नहीं हो पाती, अफरा-तफरी मच जाती है, समय बरबाद होता है, धन बरबाद होता है और देश की संपत्ति का सत्यानाश होता है। वे “आओ भारत बंद कराएँ” में कहती हैं कि ऐसे कार्यों से देश जाम हो जाता है, सड़कें जाम हो जाती गेन, ट्रेन की पटरियाँ अवरुद्ध हो जाती हैं, स्कूल-कॉलेज पर असर पड़ता है, पूरे देश में तांडव फैला रहता है, जिंदगियाँ बड़ी असमंजस में रहती हैं, हत्याएँ हो जाती हैं, ट्रेन, बसें, ट्रक, टेम्पो, बाइक इत्यादि जला दिए जाते हैं। आम जनता उजड़ जाती है। नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ता है। उनकी कविताएँ “प्रकृति” पर हैं, “बादल” पर हैं, “तितली” पर हैं और “चिड़ियों” पर भी हैं। वहीं उनकी कविताओं में फिलॉसफी भी है। जब आप उनकी कविताएँ “वक्त” पढ़ेंगे तो सार्वभौमिक सत्ता और उस सत्ता से उत्पन्न जीवन पर एक दर्शन से परिचित होंगे। उनकी पंक्ति कितनी खूबसूरत अर्थों वाली है जिसे व्याख्या की जरूरत नहीं है:

वक्त तो रेत के मानिंद है,

फिसल जाता है।

बिना रुके ही ये हाथों से,

निकल जाता है।।

इसी तरह “लहू का रंग एक है” और “ब्लड बैंक” में मानवता का दर्शन है जिसमें दो बातें दिखाई देती हैं-एक तो सब का खून एक जैसा है अर्थात जातिवाद का जहर मत घोलो। दूसरा- खून दान देने से दूसरे जीवन की रक्षा संभव है। “प्रकृति का दर्द”, “गंगा की व्यथा”, “बछड़े का दर्द” प्रकृति का दर्शन है। “चल गाँव की ओर” प्रकृति से जुड़ा दर्शन है। शहर बहुत ही विकृत और गंदा हो चुका है। गाँव में ही शुद्धता और मानवता है इसलिए, कवि ने शहर से गाँव की ओर लौटने का आह्वान किया है। अब यहाँ वैचारिक मतभेद हो सकता है। कोई कह सकता है कि डॉ. आम्बेडकर ने गाँव को जाति का कारखाना कहा है इसलिए दलितों के लिए गाँव उचित स्थान नहीं है। दूसरी बात, गाँव में जमीनें हमारी नहीं हैं। हम वहाँ खेत मजदूर हैं। उम्र पर्यन्त और पीढ़ी दर पीढ़ी हमें गरीब और खेत मज़दूर ही रहना पड़ेगा इसलिए दलितों के लिए गाँव बेकार है। गाँव में दलितों के लिए न शिक्षा है, न रोजगार है इसलिए जितनी जल्दी हो गाँव छोड़ देना दलितों के हित में है। वस्तु-परिस्थितियाँ कहती हैं दलितों के लिए गाँव अनुपयोगी है लेकिन अधिभौतिक अवधारणा में मानवतावाद कहता है कि गाँव को पूँजीवाद ने विकृत और कुसंस्कृत बना दिया है। अब वहाँ सज्जन मनुष्य के रहने लायक नहीं है। उनकी कुछ कविताएँ “अंतर्मन की पीड़ा”, “मेरी जिंदगी”, “खामोश किनारा”, “कागज की किश्ती मैं”, “थामा था मेरा हाथ” में बहुत कुछ निजी जीवन की अनुभूतियों पर आधारित है। ये कविताएँ नॉस्टैल्जिक प्रवृत्ति की हैं। हालाँकि, उन्हें नॉस्टैल्जिक कहकर उनकी उपेक्षा करना वस्तु-परस्थिति के साथ न्याय करना नहीं होगा क्योंकि उनका व्यक्तिगति जीवन भी सामाजिक ताने-बाने का भौतिक जीवन ही है। उन पर अनुभूतियां यथार्थ हैं।

“अंतर्मन की पीड़ा” निजी अनुभूति की गहरी पीड़ा से युक्त है। उनकी उस पीड़ा को समझते हुए भी सार्वजनिक नहीं किया जाना ही नैतिक है। ऐसी कितनी ही पीड़ाएँ हैं जो मनुष्य सार्वजनिक नहीं करता है और ताउम्र शिद्दत से उस पीड़ा को महसूस करता रहता है।

अंतर्मन की गागर जब पीड़ा से भर जाती है।

चुपके से तब नायनकोर से ये छलक ही जाती है।।

यह कविता मीरा की कविताओं की तरह गाया जा सकता है। इस कविता में और मेहनत करके इसकी मात्राओं के आधार पर इसमें तग़ज़्ज़ुल भरा जा सकता था। इसमें कई ऐसे शब्द हैं जिनको स्थानान्तरित कर मुखड़े को खूबसूरत बनाया जा सकता था लेकिन, कवि में स्व का एक चिंतन भी कार्य करता है जिसके चलते वह अपनी पंक्तियों से कई बार संतुष्ट हो जाता है जिससे उसके परिष्कार की जरूरत से वह मुक्त मान लेता है। ऐसा कवि के साथ इस कविता में दृष्टिगोचर होता है। उपर्यक्त कविता में व्यक्त अंतर्मन से अधिक मुखरित अंतर्मन “खामोश किनारा” और “कागज की किश्ती मैं” में होता है। इन कविताओं में निजता बहुत ही स्पष्ट होकर जीवन-साथी के संग बिताए पल को व्यक्त कर देता है और शेष जीवन के असह्य पीड़ा को अकेले व्यतीत करने की चिंता से भर देता है।

“वाल्मीकि” दलित समुदाय व जाति है। इनका पारम्परिक काम मल-मूत्र को साफ करना और अन्य सफाई कार्य करना होता है। इन्हें भारतीय जाति व्यवस्था में सबसे नीचा स्थान दिया जाता है और इस कारण ये बहुत शोषित वर्ग है। पंजाब में बसे चूहड़ा को भी इनका भाग माना जाता है जो सिख धर्म के मजहबी सिख अनुभाग को बनाते हैं। वाल्मीकि नाम वाल्मीकि से लिया गया है जिन्हें ये समुदाय अपना गुरू मानता है। इनका मूल नाम भंगी है जिसका अर्थ भांग पीने वाला होता है लेकिन ये अब अपमानजनक माना जाता है और इसका उपयोग सामाजिक रूप से सही नहीं माना जाता है। कुछ वाल्मीकि अपने को हरिजन कहलाना भी पसंद करते हैं। वाल्मीकि आज भी साफ-सफाई का कार्य ही करते हैं और ये उनका रोजगार का मुख्य हिस्सा है। उनके कई सगंठन भी मौजूद है जो सरकारी नौकरी में इस कार्य में किसी और जाति के लोगों के आगमन का विरोध करते हैं। गूगल पर श्री कँवल भारती पर कमेंट करते हुए मैंने आर जे सिंह को पढ़ा था कि ”भंगी” शब्द को “भंगेड़ियों” से जोड़ना मन की कोरी-कल्पना भर है। ”भंगी” शब्द हिन्दी का शब्द है जिसका अर्थ “विच्छेद करना” होता है। मुस्लिम शासनकाल में कुतुब्बुदि्न ऐबक से लेकर अलाउद्दीन ख़िलजी, फिरोज़शाह तुगलक और मुगल शासकों द्वारा हिन्दुओं को बल पूर्वक मुस्लिम धर्म अपनाने को बाधित किया गया और इनको मुख्यधारा से काटकर (विच्छेद कर ) अलग कर दिया गया, जो बाद में “भंगी” कहलाए। जिन हिन्दूओं ने धर्म परिवर्तत कर लिया वो “अधभरिये” या “बदले हुये मुसलमान” कहलाए और जिन्होंने इस्लाम नहीं अपनाया, वो मुस्लिमों के गुलाम बनकर रहे और जिन्होंने अड़कर अपना धर्म नहीं बदला, उनको मुस्लिम शासकों द्वारा सजा के रूप में मुस्लिमों का मल (पयखाना) उठवाने को मजबूर किया गया। सज़ा के तौर पर उन हिन्दुओं को कोई भी कार्य ना करने की भी सज़ा दी गई एवं उनको अपनी झूठन खाने को मजबूर किया गया और उनकी बस्तियाँँ गाँव-नगर के बाहर तालाबों (जोहड़ों) के किनारे बसाई गयी तथा उसी तलाब का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर किया गया। और तो और, इन्हीं जिद्दी हिंदुओं को सज़ा के तौर पर “सुअर” भी खाने को बाधित किया गया जबकि पुरातन काल में सुअर का मांस हिन्दुओं द्वारा खाने का कहीं जिक्र नहीं है। ”सुअर” जिसे हिंदी में “शूकर” और संस्कृत में “वाराह” कहा जाता है, उसे कोई हिन्दू नहीं खाता था क्योंकि “वाराह” को विष्णु का अवतार माना जाता है। मुस्लिम चूँकि सूअर से नफरत करते हैं इसीलिए सज़ा के तौर पर इन बेचारे को सूअर खाने के लिए मजबूर किया गया लेकिन इन हिन्दुओं ने अपना धर्म नहीं बदला और सजा के तौर पर ‘भंगी” कहलाए और अपने धर्म को लेकर अड़े रहे। यह भंगी जात केवल वहीं मिलती थी जहाँ-जहाँ मुस्लिम राज्य रहा। बाद में ये पूरे देश में बिखर गए।

इस देश में अन्य जातियाँ भी है जो बदतर जिंदगी जी रही हैं, ख़ानाबदोश हैं, मरणासन्न हैं, जंगल में निवास करते हैं तथा कंदमूल, पौधों की जड़ें, जानवर और मछलियां खाकर गुजर-बसर करते हैं लेकिन झाड़ू और टट्टी नहीं कमाते हैं। वैसे भी दलित जातियों की हालत गाँव और शहरों में भी लगभग ऐसे ही है। ये गाँव में दक्षिण, गड्ढों व नदियों के किनारे व शहर में नाले के किनारे बसते हैं। डेंगू, मकेरिया, मच्छर, टीवी, हैजा, अतिसार, पेचिस के शिकार अधिकतर ये ही होते हैं क्योंकि इन्हें न शुद्ध हवा मिलती है और न शुद्ध पानी। ज्यादेतर ये झुग्गी झोपड़ियों में ही रहते हैं। “कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ेगा”-इन जातियों के लिए यह सूत्र वाक्य है। “शैक्षिक क्रान्ति की मशाल” और “शिक्षालय की राह बनाओ” कविता में डॉ. राधा वाल्मीकि ने बहुत खूसूरत नशीहत और प्रेरणा दी है। कविताओं की कुछ पंक्तियाँ देखने लायक है:

शिक्षित बनो गटर से निकलो,

खुली हवा में साँस लो।

पुश्तैनी पेशे को छोड़ो,

कुछ नए अहसास लो।।

(शैक्षिक क्रान्ति की मशाल, पेज 45)

लेकर हाथ में कलम किताबें,

शिक्षालय की राह बनाओ।

निश्चित मिले सम्मानित जीवन,

शिक्षा को तुम शस्त्र बनाओ।।

(शिक्षालय की राह बनाओ, पेज 47)

डॉ. राधा वाल्मीकि ने वाल्मीकि जातियों के प्रति उस भेदभाव जनित मानसिकता को भी अपनी कविता में स्थान दिया है। वे अपनी कविता “आखिर क्यूँ” में आश्चर्य करती हैं कि विज्ञान के युग में उन्नति टेक्नोलॉजी के होते हुए भी एक जाति विशेष के लोग घोर गंदगी से युक्त सीवरों में बिना किसी मॉस्क के उतरते हैं। सीवरों के जहरीले गैस में दम तोड़ देते हैं। व्यवस्था है कि आधुनिक युग में भी इतनी निष्ठुर है। उसे सत्ता चाहिए। उसे मुनाफा चाहिए। उसे वर्चस्व चाहिए। यही कार्य कोई सवर्ण नहीं करता है, न करने दिया जाता है। एक बात तो है, सवर्ण मरना पसंद करता है लेकिन मनुष्य की टट्टी उठाना पसंद नहीं करता है। वह भले नौकरी न पाए औए भूखों मारे लेकिन सड़क पर झाड़ू लगाने, सीवरों में उतरने, घरों में लैट्रिन टैंक साफ करने, संडास में हाथ डालने का कार्य कतई नहीं करता है। डॉ. आम्बेडकर ने अपने भाषणों में वाल्मीकि जातियों को सम्बोधित करते हुए कहा है कि कमाने-खाने का कोई और तरीका अपनाओं किन्तु झाड़ू और लैट्रिन साफ करने का कार्य निश्चित रूप से छोड़ दो।

वाल्मीक जातियों की समस्याएँ व्यवस्था जनित है। इसे तब तक ठीक नहीं किया जा सकता है जब तक व्यवस्था को बदल नहीं दिया जाता है। हाँ, एक बाद हमें और याद रखनी पड़ेगी कि पूँजीवादी लोकतांत्रिक प्रणाली की व्यवस्था से भारत की दलित जातियों की समस्या कभी नहीं बदली जा सकेगी। ऐसा मैं इस कारण कह रहा हूँ क्योंकि दलित समाज के बहुत से बुद्धिजीवी, क्रान्तिकारी व कार्यकर्ता यह मानते हैं कि संसदीय लोकतंत्र नहीं खराब है बल्कि इसे लागू करने वाले खराब है जबकि संसदीय लोकतंत्र एक अनुपयोगी व्यवस्था है। इसे जल्द से जल्द खत्म कर लेने की आवश्यकता है। इस बात को सिर्फ मैं नहीं, मुझसे बहुत पूर्व डॉ. आम्बेडकर साहब ने भी कहा है। उन्होंने लिखा है, “किसी ऐसे व्यक्ति की बहुत आवश्यकता है जिसमें भारतीयों से यह कहने के लिए पर्याप्त शाहस हो कि संसदीय लोकतंत्र से बचिए। यह सर्वोत्तम पद्धति नहीं है जैसा कि वह दिखाई देती है।” (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खण्ड-18, पेज 96)। इसी लेख में आगे डॉ. आम्बेडकर लिखते हैं, “संसदीय लोकतंत्र सरकार का ताना-बाना होते हुए भी वास्तव में एक वंशानुगत शासक वर्ग द्वारा वंशानुगत प्रजा वर्ग की सरकार है।” (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खण्ड-18, पेज 98)। ऐसी व्यवस्था में पूँजीवादी व्यक्तिवाद हावी रहता है। इस व्यवस्था में उत्पादन के साधन निजी हाथों में कैद होते हैं और उत्पादन का उद्देश्य अवाम के आवश्यक आवश्यकता की पूर्ती न होकर अधिकतम मुनाफा कमाना होता है जिसके कारण मशीनों से काम लिए जाने वाले कार्यों को भी वाल्मीकि जातियों से करवाया जाता है। चूँकि पूँजीवाद का गठजोड़ ब्राह्मणवाद से है, अतः पूँजीवाद ब्राह्मणवाद को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर मजदूर वर्ग को वर्गीय एकता से दूर रखता है तथा उँच और नीच के जातिवादी विचार में बाँट रखता है।

पुस्तक- अंतर्मन की पीड़ा (काव्य संग्रह)

संपादक- राधा वाल्मीकि

प्रकाशक- रवीना प्रकाशन, दिल्ली

समीक्षक

आर. डी. आनंद

L-1316, आवास विकास कॉलोनी,

बेनीगंज, फैज़ाबाद-अयोध्या-224001

मो. 9451203713

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