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पुस्तक मेला

डॉ.मनोज कुमार

डॉ.मनोज कुमार

कविता

January 20, 2017

पुस्तक मेला
अजब का है खेला ये है पुस्तक मेला
कहीँ पर दुकानें सजी पुस्तकों की
कहीँ पर लगा लेखकों का झमेला
यह है पुस्तक मेला यह है पुस्तक मेला
कोई बन रहा है कवि कोई राईटर
कोई बन रहा है कहानी का फाइटर
कहीँ एक कोने में मै हूँ अकेला
यह है पुस्तक मेला यह है पुस्तक मेला
ये मेला किताबों की या दुकानदारी
यहाँ नव्य लेखक है लगते भिखारी
बूढ़े लेखकों ने नयों को ढकेला
यह है पुस्तक मेला यह है पुस्तक मेला
ये पुस्तक प्रकाशक रखें गिद्ध दृष्टि
समझते ये मुट्ठी में लेखन की सृष्टि
ये गुरु मानते खुद को दूजे को चेला
यह है पुस्तक मेला यह है पुस्तक मेला
चादर को ओढ़े लिपिस्टिक लगा कर
खड़ी है कहीँ गुरु -घंटाल टोली
लोकार्पण कहीँ पर नई पुस्तकों की
है लगती यहाँ पर हँसी या ठीठोली
मुफ़त में किताबें है सब लूट लेते
नये लेखकों को ना मिलता है धेला
यह है पुस्तक मेला यह हैँ पुस्तक मेला
कहीँ पर मिलेंगे दो प्रेमी भगोड़े
वे एक दूसरे के अधर को निचोड़े
किताबों के पीछे बेशर्मी थी उनकी
वो था गुप्त ज्ञानम या गरमी थी उनकी
मचाए हुये थे वहीँ ठेलम ठेला
यह है पुस्तक मेला यह है पुस्तक मेला
मै माथा पिटूँ या खरीदूँ किताबें
या मेले से भागूँ मै बटुवे को दाबे
कहूँ क्या जो मेले मेँ है मैने झेला
यह है पुस्तक मेला यह है पुस्तक मेला
डॉ.मनोज कुमार
मोहन नगर गाज़ियाबाद

Author
डॉ.मनोज कुमार
डॉ.मनोज कुमार शिक्षा : पीएचडी पेशा: कंसलटेंट बायोकेमिस्ट नरेंद्र मोहन हॉस्पिटल गाजियाबाद प्रकाशन: देश के पत्र पत्रिकाओं में अनवरत रूप से जैसे: अंतरराष्ट्रीय पत्रिका “सेतु” (अमेरिका) का जून 2017 अंक, हिंदी मासिक पत्रिका "ट्रू मीडिया",, मशाल(साझा-काव्य संग्रह) ,वर्तमान अंकुर ,विजय... Read more
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