कविता · Reading time: 1 minute

पुलिस मेरे शहर की

पुलिस मेरे शहर की

अपनी पर आ जाए तो
मुर्दों से भी उगलवाती है
जटिल से जटिल मामला
यूं मिनटों में निपटाती है
पुलिस मेरे शहर की||

सुस्ती और लापरवाही में
कितने मामले दबाती है
चाय – पानी के बगैर ये
महीनों भर लटकाती है
पुलिस मेरे शहर की||

मामला कुछ और होए
उसे और कुछ ही बनाती है
सीधे -साधे मामलों को भी
बे वजह ले दे उलझाती है
पुलिस मेरे शहर की|

पैसे वाले के समक्ष तो
ये नतमस्तक हो जाती है
गरीब,वंचित,असहाय को
पीटती और धमकाती है
पुलिस मेरे शहर की||

नशा माफिया और जुआरी
पकड़ कर नहीं लाती है
आ जाए हाथ शरीफ कोई
क्या – क्या धारा लगाती है
पुलिस मेरे शहर की||

-विनोद सिल्ला©

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