पुलवामा

ये भी तो हैं लाल किसी के
देते जो सीमा पर पहरा
हँसते हँसते जान गँवाते
प्यार वतन से इनका गहरा

भीग रहा रह रह कर मन है
कायर हत्यारा दुश्मन है
करता है ये वार पीठ पर
हमें काटना है लेकिन सर
रोष बड़ा जनता में भारी
हुआ प्रशासन क्यों कर बहरा

दूर हुई है माँ बेटे से
बहना रेशम के धागे से
छिन सिंदूर गया बीबी का
कंधा टूटा बाबूजी का
कहीं बिलखता भोला बचपन
जीवन लगता जैसे सहरा

आज तिरंगा फिर रोया है
वीर गोद में जो सोया है
कैसे लेकर घर को जाये
घरवालों से आंख मिलाये
लिपटा यूँ सैनिक के तन से
नहीं हवा से भी वो लहरा

नेताओं को कुर्सी प्यारी
करते तभी सियासत भारी
थाह नहीं अपनों की पाई
मात यहीं पर हमने खाई
सरहद पर वीरों के आगे
कभी नहीं है दुश्मन ठहरा

22-02-2019
डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद

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