गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

पुरखों की निशानी बेच देते हैं

महज सिक्कों में अपनी ज़िंदगानी बेच देते हैं
नयी मिल जाए तो चीजें पुरानी बेच देते हैं

तड़पता प्यास से व्याकुल जो कोई आये चौखट पर
तो भरकर बोतलों में लोग पानी बेच देते हैं

मेरे दुःख,दर्द की बातों को लिखकर के किताबों में
वो अपने नाम से मेरी कहानी बेच देते हैं

फंसे लालच के पंजे में या है फिर कोई मज़बूरी
ना जाने लोग क्यों लड़की सयानी बेच देते हैं

जिन्हे दो जून की रोटी मयस्सर हो नही पाती
नशे के वास्ते अपनी जवानी बेच देते हैं

जो लायक हैं नमन करते हैं पुरखों की अमानत को
हैं जो खुदगर्ज पुरखों की निशानी बेच देते हैं

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