Jan 21, 2017 · कविता
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पुकार- एक बेटी की

माँ…माँ…माँ ..
कौन…?
माँ…मैं हूँ तुम्हारे अंदर पल रहा…
तुम्हारा ही अंकुर…
जिसे तुमने….हाँ तुमने…
कितनी ही रातें…कितने ही दिन..
अपने अरमानों सा… पाला है…
सजाया है….
माँ मैं तुम्हारी.. हाँ तुम्हारी अपनी सन्तान….
तुम्हारी अपनी बेटी….।
जिसे तुमने ….अपने सपनों से पंख देने थे…
जिसके लिए क्या कुछ सोंचा था तुमने….
मगर क्या हुआ….जो आज तुम मुझे दुनिया में…. आने से रोंक रही हो….
माँ समझती हूँ तुम्हारा दर्द….
तुम्हे यहीं डर है न ….
तुम्हे ताने देंगे…बाबा..दादी..या वो… पड़ोस वाली ताई… मेरे पैदा होने पर…
मैं घर का चराग जो नहीं…
मैंने सुना है बाबा को कहते…कि बेटा घर रौशन करता है…
खुशियों से..अरमानों से…और हाँ कमाई से भी….
कितना मुश्किल होगा… मैं जब बड़ी होउंगी…
घर से बाहर समाज में….क्या भेड़ियों की भूखी निगाहों से…
लाज बचा पाऊँगी तेरे अरमानों की….
यहीं डर है न तुझे माँ……
तो सुन …. मैं तेरी बेटी नहीं तेरा बेटा बनूंगी…
हर कदम तेरे साथ….
तेरी आँख बनकर तुझे रौशनी दूंगी……
माँ मैं जीना चाहती हूँ….
उड़ना चाहती हूँ मुक्त आकाश में….
माँ तेरे… बाबू जी के…
सपनों को लेकर….
माँ मुझे मत मारो…मैं जीना चाहती हूँ….
तेरे घर का चिराग बनकर….
जगमगाना चाहती हूँ…..सारी दुनिया में…
कभी लक्ष्मी बाई बनकर…
कभी इंदिरा गांधी…तो कभी…
कल्पना चावला बनकर…..
माँ तू भी तो….बेटी ही है….
जरा सोंच …अगर….
नानी तुझे दुनिया में न आने देती….
तो क्या आज तू होती….
नहीं माँ नहीं…..
मुझे मत मारो….मुझे जीना है….
उड़ना है मुक्त आकाश में…
अपनी मुट्ठी में ढेरों तारे लिए……
चमकना है खुद एक सितारा बनकर….
माँ तेरी और बाबा की आँखों का…
तारा बनकर….
बोल माँ जीने देगी मुझे….
बोल उड़ने देगी मुझे….
क्या मेरा हक देगी मुझे….
बोल…माँ बोल…
जीने देगी मुझे …?
मैं जीना चाहती हूँ माँ …
मुझे जीने दे….मुझे जीने दे माँ…
माँ …माँ…बोल न माँ…बोल माँ बोल….
माँ….माँ….माँ….

राहुल द्विवेदी ‘स्मित’
लखनऊ
7499776241

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