पीड़ा

पीड़ा जब भी आई है ,
नहीं किसी को भाई है ।
हर्षित होकर कोई न उठता ,
अतिथि पीड़ा के स्वागत में ,
फिर भी पीड़ा करती रहती ,
हरदम सबकी मेहमानी ।
राजा हो या रंक सभी में ,
इसका आता एक समय है ।
फिर भी जाने क्यों कर इससे ?
सबको नफ़रत, सबको भय है ।
पीड़ा ऐंसी मित्र कि जिसको ,
नहीं किसी से कोई स्वारथ ,
फिर भी इसकी आगवानी को ,
आगे हाथ न कोई बढ़ता ।
इसका साथ लिया जिस-जिस ने ,
उनको इसने दिया है जीवन ।
पीड़ा के पतझड़ में मित्रो ,
खिलता जाता जीवन-उपवन ।
पीड़ा की ही अनुकम्पा से ,
मीरा को मिलते कान्हा जी ।
शांति मिल जाती जीसस को ,
और बुद्ध​ को मिलती सिद्धि ।
तुम भी अगर अपना लो पीड़ा ,
बड़े प्यार से , बड़े गर्व से ।
तो ये तुम्हारे​ जीवन में भी ,
करती रहेगी हरपल हरदम ,
नये-नये अनुभव की वृद्धि ।

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