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पिय नहि समझे

dr. pratibha prakash

dr. pratibha prakash

कविता

August 11, 2016

पीर जिया की पिय नहीं समझे
जग को दिखान से का होय जाहि
आँख न समझे आँख की व्याधा
नीर बहाये से का होय जाहि
नदिया बन गई नैनन कोरें
मिलन ज्वार हिय में उठि आयि
सावन बन के बदरा वरषे
प्यास जिया की बुझ नहि पायि
मेघा रो रो विरह सुनावे
ले ले नाम बस तोहे बुलायि

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Author
dr. pratibha prakash
Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त हुई ,बाद में हिन्दी प्रेम संस्कृति से लगाव समाजिक विकृतियों आधुनिक अंधानुकरण ने साहित्य की और प्रेरित किया ।उस सर्वोच्च शक्ति जसे ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु... Read more

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