कविता · Reading time: 1 minute

पिपासा

न तृष्णा रही शेष ही आज कोई न है ब्रह्म को जानने की पिपासा
नहीं चाहता मोक्ष को भी सुनो मैं नहीं बन्ध कोई लगा है भला सा
नहीं चाहता सिद्धि विज्ञान वाली बुलाये भले ही मुझे आज नासा
सदा प्यास मैं झेलता ही रहा हूँ न जाने मुझे विश्व में कोई प्यासा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

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