कविता · Reading time: 2 minutes

पिता

“पिता”
*****

पिता होते हैं परिवार की धूरी –
जिनके बिना रहती है
बच्चों की दुनिया अधूरी –
यह सच है मां
अतुल्य कष्ट सहकर
संतान को जन्म देती है
लेकिन हम नजरअंदाज नहीं कर सकते
पिता की कुर्बानियों को –
जो लहू का कतरा देकर भी उठाते हैं
परिवार की जिम्मेदारियों को –
दूर करते हैं
बच्चों की परेशानियों को –
और यदा-कदा सहते हैं
हंसकर उनकी मनमानियों को –
अपना खून-पसीना बहाकर
जुटाते हैं परिवार के लिए
सुख-सुविधा के संसाधन –
उनकी खुशियों के लिए
अक्सर करते हैं
निस्वार्थ भाव से
अपनी इच्छाओं का दमन –

प्रतिफल की आशा किए बिना
लुटाते हैं सब पर अपना प्यार –
लेकिन यदा-कदा ही मिलता है उनको
अपनों का आभार –
माता की तो ख़ैर किसी से
तुलना ही बेकार है –
लेकिन पिता की धूरी भी तो
उनका घर परिवार है –
अगर कर्तव्य में चूक गए
तो क्या समाज,
क्या परिवार –
क्या दोस्त,
क्या रिश्तेदार –
उन्हें कोई नहीं करता है माफ –
अपनी ही संतानों से उनको बहुधा
मिलता नहीं है इंसाफ –

एक राम थे जिन्होंने
पितृ वचन का सम्मान किया –
एक श्रवण कुमार ने
मात-पिता की भक्ति में
अपना जीवन दान दिया –
आज की पीढ़ी को भी उनसे
कुछ सीख लेनी चाहिए
जीवन भर,
पग-पग पर जिस पिता ने
अपने बच्चे का भविष्य संवारा है
दी उसको अपनी थाती है –
वो भी तो जीवन के उत्तरार्ध में
अपने पिता को यह संबल दे
कि आगे के जीवन-पथ पर
वो ही उनकी लाठी है –

यही संदेश आज सभी के
घर-घर में पहुंचाना है –
और एक ही दिन नहीं
साल के हर दिन
पितृ-दिवस मनाना है।

©पल्लवी मिश्रा ‘शिखा’, दिल्ली।

3 Likes · 4 Comments · 43 Views
Like
4 Posts · 1k Views
You may also like:
Loading...