कविता · Reading time: 1 minute

पिता –

जो जीता है,
एक हंसी के लिए।
करता है श्र म, निरन्तर बिना थके,
एक कामयाबी के लिए।
बांटता फिरता है अविरल स्नेह समदर्शी बन,
प्रत्येक संतान के लिए।
जो सिर्फ देना जानता है,
चाबी खुशियों की , सौगात दुआओं की।
लेना जानता है ,
अपनी औलाद के सारे दुःख, उलझनें समस्त दिशाओं की।
सारे झंझटो का पहाड़ ,
लिए घूमता रहता है स्वयं ही।
दिखाता फिरता है झूठी मुस्कान।
घर में आते ही उड़ेल देता है ,
सारे अरमान खुश होकर औलाद की झोली में।
भूल जाता है जमाने भर का तिरस्कार मुस्कान भोली में।
क्रोध और बदला जिसकी फितरत में नहीं।
रेखा कहलाता है जग में पिता वही।
जो जीता है,
सिर्फ छांव बन औलाद के लिए।

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