कविता · Reading time: 1 minute

पिता कैसे जीता है ।

पितृ दिवस पर-
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पिता है,
उंगलि पकड चलना सिखलाया,
सही गलत में भेद सिखाया ।
बच्चे की खातिर सब कष्ट सह लेता है ।
वह पिता है ।
कंधे सदा सहारे देते,
हर सम्भव जिद पूरी करते
पालन करना धर्म समझते
धूप ठंड या हो बरसात,
हरदम देते मेरा साथ,
प्यारे बच्चों की खातिर
जीता है ।
वह पिता है ।
पहले खिलाए फिर खाएं
रक्षा प्रहरी खुद बन जाए
सचमुच धरती पर भगवान
हम जिसकी है संतान,
सदोपदेश की गीता है।
वह पिता है ।
पूरे घर का भार उठाएँ
श्रम से थक कर घर जब आए
फटे वस्त्र से काम चलाए
टूटे चप्पल खुद सी लेता है ।
वह पिता है ।

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